इंडिया नैरेटिव में प्रकाशित चुक्वुडी ओकेके के आर्टिकल में कहा गया है कि नैरोबी की बस्तियां और लागोस की अनौपचारिक बस्तियां कभी पोस्टल कोड को ध्यान में रखकर विकसित नहीं की गई थीं और जल्द ही वहां पोस्टल कोड मिलने की संभावना भी नहीं है।
यह समस्या केवल अफ्रीका तक सीमित नहीं है और यही महत्वपूर्ण बात है, क्योंकि इसका मतलब है कि इसका समाधान संभव है। करीब एक दशक पहले भारत भी इसी तरह की अव्यवस्थित स्थिति से गुजर रहा था, जहां पता बताने का मतलब होता था, “दूसरे स्पीड ब्रेकर के आगे नीले गेट के पास।”
आर्टिकल के अनुसार, भारत के स्टार्टअप्स ने इस अव्यवस्था से बाहर निकलने के लिए अपनी सोच में बदलाव किया। उन्होंने लॉजिस्टिक्स को पहले डेटा और भरोसे की समस्या माना और उसके बाद ट्रकों तथा गोदामों की समस्या। यही सोच में बदलाव, किसी खास ऐप से ज्यादा महत्वपूर्ण है, जिसका अध्ययन केन्या और नाइजीरिया के उद्यमियों और नीति निर्माताओं को करना चाहिए।
आर्टिकल में कहा गया है कि सरकार द्वारा पता प्रणाली को ठीक करने का इंतजार करने के बजाय लॉजिस्टिक्स स्टार्टअप्स को अपनी लोकेशन इंटेलिजेंस विकसित करनी चाहिए। उन्हें हर सफल और असफल डिलीवरी से सीखते हुए उपभोक्ता के सटीक स्थान तक पहुंचने की समस्या का समाधान करना चाहिए।
आर्टिकल में कहा गया है, “एक संरचनात्मक विकल्प सीधे अपनाने लायक है। सरकार को निजी कारोबार की प्रतिद्वंद्वी के बजाय इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदाता के रूप में देखा जाना चाहिए।”
आर्टिकल में यह भी बताया गया है कि अफ्रीका के स्टार्टअप्स को केवल राष्ट्रीय राजधानियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। समान उभरते बाजारों में सबसे बड़ी वृद्धि बड़े शहरों से नहीं, बल्कि उन दूसरे और तीसरे स्तर के शहरों से आई है, जिन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया था।
