मध्य पूर्व में ईरान बनाम अमेरिका और इजरायल युद्ध ने वैश्विक स्तर पर भारी तबाही मचाई है। हालांकि अब अमेरिका और ईरान ने दो सप्ताह के लिए युद्धविराम (सीजफायर) घोषित किया है, लेकीन पिछले 5 सप्ताह से चल रहे इस भयावह युद्ध ने लोगों की जिंदगियों पर गहरी छाप छोड़ी है। इस युद्ध ने न सिर्फ हजारों लोगों की जान ली है, बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था को भी गहरे संकट में डाल दिया है। अब तक इस संघर्ष के चलते वैश्विक GDP को करीब 54.88 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है, जबकि हालात और बिगड़ने पर यह आंकड़ा 3.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
ईरान सबसे ज्यादा प्रभावित
इस युद्ध की सबसे बड़ी कीमत ईरान ने चुकाई है। अमेरिकी और इज़राइली हमलों में अब तक 7,300 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 25,000 से अधिक घायल हुए हैं। स्कूल, अस्पताल और ऐतिहासिक इमारतें तबाह हो चुकी हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यदि युद्ध जारी रहा तो ईरान की GDP में 10% से अधिक गिरावट आ सकती है। हालांकि सीजफायर पर मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार समझौते के तहत अमेरिका ने इस नुकसान का मुआवजा देने पर हामी भरी है।
युद्ध में अमेरिका पर आर्थिक बोझ :
संयुक्त राज्य अमेरिका इस युद्ध में सीधे मैदान में होने के नाते भारी आर्थिक दबाव झेल चूका है। अमेरिका के इस युद्ध में अब तक करीब 7.49 लाख करोड़ रुपये (80.4 बिलियन डॉलर) ख़ाक हो हैं। विश्लेषण के अनुसार, यह नुकसान 210 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है, जिसमें ऊर्जा बाजार और व्यापार में रुकावट प्रमुख कारण हैं।
इज़राइल को भी भारी नुकसान
इजरायल भी इस युद्ध में गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। अब तक 30 से ज्यादा लोगों की मौत और हजारों के घायल होने की खबर है। आर्थिक तौर पर इज़राइल को लगभग 15 अरब डॉलर का नुकसान झेलना पड़ा है।
खाड़ी देशों पर गहराता संकट
युद्ध का असर सिर्फ इन तीन देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र में संकट गहरा गया है। कुवैत और क़तर की GDP में 14% तक गिरावट का खतरा मंडरा रहा है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अर्ब में आर्थिक सुस्ती और तेल उत्पादन प्रभावित है। इराक में तेल उत्पादन 70% तक गिरा है। लेबनान में इजरायली हमलों के बाद 1,400 से ज्यादा मौतें हो चुकी है और लेबनान को 14 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा है। इसके अलावा बहरीन, ओमान और जॉर्डन जैसे देशों में भी मिसाइल हमलों से जनहानि और इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा है।
भारत पर भी असर, जेब पर पड़ रहा बोझ
भारत पर इस युद्ध का सीधा असर भले सीमित हो, लेकिन आर्थिक प्रभाव साफ दिखाई दे रहा है। युद्ध के दौरान भारतीय शेयर बाजार करीब 37 लाख करोड़ रुपये का नुकसान देख चुका है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी झेल चूका है। हालांकि की केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गई और आम लोगों की जेब पर असर नहीं पड़ने दिया। लेकीन इससे सरकारी तिजोरी को 1.5 लाख करोड़ रुपये का झटका लगा है। LPG की कमी और ‘पैनिक बाइंग’ की स्थिति निर्माण हुई। कच्चे तेल की कीमत फरवरी के $69 प्रति बैरल से बढ़कर अप्रैल में $125.88 तक पहुंच गई है।
दुनिया भर में ऊर्जा संकट
युद्ध के चलते वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है, जिससे 1973 के तेल संकट जैसे हालात बनते नजर आ रहे हैं।
- पाकिस्तान में स्कूल बंद, वर्क फ्रॉम होम लागू
- श्रीलंका में ऊर्जा बचाने के लिए साप्ताहिक छुट्टी
- फिलीपींस में नेशनल एनर्जी इमरजेंसी
- चीन ने ईंधन निर्यात पर रोक लगाई
तेल की कमी ने व्यापक महंगाई को जन्म दिया है। ट्रांसपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग लागत बढ़ने से प्लास्टिक, केमिकल, टेक्सटाइल और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ रही हैं।
हालांकि अब दो सप्ताह के सीज़फायर पर सहमति बनी है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ अस्थायी राहत है। यदि स्थायी समाधान नहीं निकला, तो यह युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था और मानव जीवन पर और भी गंभीर असर डाल सकता है। कुल मिलाकर, यह संघर्ष सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक संकट बन चुका है, जिसका असर हर देश और हर व्यक्ति तक पहुंच रहा है।
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