संसद में महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों पर लंबी बहस के बाद अब इन्हें शुक्रवार (17 अप्रैल)को मतदान के लिए पेश किया जाएगा। लोकसभा में 30 घंटे से अधिक चली तीखी चर्चा के दौरान सत्तारूढ़ NDA और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर जोरदार टकराव देखने को मिला, खासकर आरक्षण को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने को लेकर।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतदान से पहले विपक्ष से अपील की कि वे इस विधेयक का समर्थन करें। उन्होंने संकेत दिया कि सत्तारूढ़ गठबंधन के पास अपने दम पर इस संवैधानिक संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है। उन्होंने कहा, नंबर का खेल समय तय करेगा और विपक्ष को चुनौती दी कि यदि वे इसका विरोध करते हैं, तो उन्हें महिला मतदाताओं की प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।
सरकार ने महिलाओं को संसद और राज्य विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने के उद्देश्य से तीन विधेयक पेश किए हैं। इनमें ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ में संशोधन के लिए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेशों में आरक्षण लागू करने से संबंधित विधेयक शामिल हैं। प्रस्तावित संशोधन के तहत लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 850 तक बढ़ाने का प्रावधान भी किया गया है, जबकि वर्तमान में यह संख्या 543 है।
क्या कहते हैं आंकड़े?
संवैधानिक संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए लोकसभा में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, साथ ही कुल सदस्य संख्या का कम से कम आधा उपस्थित होना जरूरी है। वर्तमान में लोकसभा में 540 सदस्य हैं (तीन सीटें रिक्त हैं), ऐसे में विधेयक पारित करने के लिए कम से कम 360 सांसदों का समर्थन आवश्यक होगा।
सत्तारूढ़ एनडीए के पास फिलहाल 293 सांसद हैं, जिनमें भारतीय जनता पार्टी के 240 सांसद शामिल हैं। इस प्रकार गठबंधन को बहुमत के लिए 67 अतिरिक्त सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है। ऐसे में कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों का समर्थन या अनुपस्थिति निर्णायक भूमिका निभा सकती है। राज्यसभा में भी स्थिति कुछ हद तक समान है। वहां दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 163 है, जबकि एनडीए के पास करीब 145 सदस्य हैं, जिससे वह बहुमत से 18 सीट पीछे है।
राजनीतिक समीकरण और आगे का रास्ता
विश्लेषकों का मानना है कि हालांकि NDA के पास दोनों सदनों में साधारण बहुमत है, लेकिन संवैधानिक संशोधन के लिए जरूरी विशेष बहुमत हासिल करना उसके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में यह विधेयक विपक्ष के रुख पर काफी हद तक निर्भर करेगा।
यह विधेयक महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इसके क्रियान्वयन को लेकर परिसीमन और जनगणना से जुड़ी शर्तों ने इसे राजनीतिक बहस का केंद्र बना दिया है। आने वाला मतदान इस बात का फैसला करेगा कि यह ऐतिहासिक प्रस्ताव संसद से पारित हो पाता है या नहीं।
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