मध्य-पूर्व में ईरान पर इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले के बाद वैश्विक तेल की कीमतों में उबाल आया है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें विश्वभर में 100 डॉलर्स को पार कर चुकी है। वहीं रुसी तेल खरीदने के लिए भारत पर भारी भरकम टेर्रिफ लगाने वाली डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिकी सरकार अब भारत को समुद्र में खड़े रूसी कच्चे तेल के बड़े भंडार खरीदने का आग्रह करने लगा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार करीब 10 करोड़ बैरल से अधिक रूसी कच्चा तेल फिलहाल समुद्र में टैंकरों पर लदा हुआ है और चीनी रिफाइनरियों में अनलोडिंग स्लॉट मिलने का इंतजार कर रहा है।
अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने CNN और CBS न्यूज़ को दिए साक्षात्कारों में बताया कि उन्होंने और अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने इस मुद्दे पर भारतीय अधिकारियों से सीधे संपर्क किया है। उनका कहना है कि यदि भारत इन कार्गो को खरीद लेता है तो इससे वैश्विक बाजार में बढ़ते तेल कीमतों से राहत मिलेगी। अमेरिका के युद्ध के कारण बढ़ती तेल कीमतों से पैदा हुई चिंता कम होगी और तेल की कीमतों में तेजी को रोकने में मदद मिलेगी।
क्रिस राइट के अनुसार कई सुपरटैंकर पिछले कई हफ्तों से समुद्र में खड़े हैं क्योंकि चीनी रिफाइनरियों में उतारने के लिए कतार लंबी है और इसमें छह सप्ताह तक का समय लग सकता है। ऐसे में इन कार्गो को भारत की रिफाइनरियों की ओर मोड़ने से तुरंत राहत मिल सकती है और बाजार में घबराहट कम हो सकती है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और वर्ष 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से उसने रियायती दरों पर रूसी तेल की खरीद काफी बढ़ा दी है। वर्ष 2025 में भारत के समुद्री तेल आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा रूसी तेल से आया था। रिलायंस इंडस्ट्रीज और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन जैसी कंपनियों की रिफाइनरियां बड़ी मात्रा में रूसी ‘यूराल्स’ ग्रेड कच्चे तेल को प्रोसेस करने में सक्षम हैं। बता दें की, अमेरिका लगातार भारत पर रुसी तेल खरीदने, न खरीदने का दबा निर्माण करता रहा है, जिसके लिए डोनाल्ड ट्रंप भारी भरकम टेर्रिफ का बोझ डालते रहें।हालाँकि भारत अपनी ऊर्जा खपत, लागत की योजना के अनुसार बिना किसी दबाव में रूस से तेल खरीदता रहा है।
यह अमेरिकी प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है। यह जलमार्ग दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल परिवहन का प्रमुख रास्ता है और हालिया तनाव के कारण टैंकरों की आवाजाही सामान्य से काफी कम हो गई है।
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत समुद्र में खड़े इन रूसी कार्गो को खरीद लेता है तो इससे स्पॉट मार्केट में खरीद की जरूरत कम होगी और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है। अनुमान है कि इससे वैश्विक बेंचमार्क कीमतों में प्रति बैरल 2 से 3 डॉलर तक की कमी आ सकती है।
हालांकि भारत की ओर से इस प्रस्ताव पर अभी आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन इससे पहले भी नई दिल्ली ने संकट के समय रूसी तेल के अतिरिक्त कार्गो खरीदने में लचीलापन दिखाया है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल पहले भी संकेत दे चुके हैं कि ऊर्जा सुरक्षा और किफायती आपूर्ति भारत के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है।
यदि भारत इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है तो चीन के लिए निर्धारित 10 से 15 बड़े कच्चा तेल टैंकरों का रुख भारतीय बंदरगाहों की ओर मोड़ा जा सकता है। इससे न केवल वैश्विक बाजार में दबाव कम होगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार में भारत की भूमिका मजबूत होगी।
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