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Friday, October 23, 2026
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चलता-फिरता विश्वविद्यालय…

अमरीश भाई सिर्फ शिक्षण संस्थानों के संरक्षक नहीं हैं, वे खुद एक विश्वविद्यालय हैं।

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-प्रशांत कारुळकर

अमरीशभाई पटेल का जन्म उज्जैन में हुआ था, जिन्हें श्री महाकाल की कृपा प्राप्त हुई थी। राजनीति से उनका नाता बहुत गहरा है, लेकिन उनकी असली पहचान शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान से है। उन्होंने राजनीति और शिक्षा से परे एक बड़ी दुनिया बनाई है।

उनका राजनीतिक सफर 1985 में शिरपुर नगर पालिका के महापौर के रूप में शुरू हुआ। 1990 से 2004 के बीच वे कांग्रेस के टिकट पर चार बार शिरपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। उन्होंने कुछ समय तक स्कूली शिक्षा, खेल और युवा कल्याण मंत्री के रूप में कार्य किया। बाद में वे विधान परिषद के सदस्य भी रहे। वर्तमान में वे विधान परिषद में भाजपा के विधायक हैं।

उन्होंने शिरपुर एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना करके शिक्षा के क्षेत्र में अपना काम शुरू किया। उन्होंने प्री-प्राइमरी से लेकर स्नातकोत्तर शिक्षा प्रदान करने वाले 70 से अधिक संस्थानों की स्थापना की। आज इन शिक्षण संस्थानों में 40,000 से अधिक छात्र पढ़ते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में उनका काम सिर्फ ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं था। उन्होंने इस काम को मुंबई तक बढ़ाया। ऐसा करते हुए उन्होंने हमेशा शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दिया। वे हमेशा इस बात से वाकिफ रहे कि शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है। उन्होंने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि उनके शिक्षण संस्थानों से पढ़ने वाले छात्रों का जीवन उज्ज्वल हो।

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वे हमेशा इस बात पर अड़े रहे कि समय के साथ शिक्षा में भी बदलाव की जरूरत है। वे मुंबई में एक बहुत ही महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थान श्री विले पार्ले केलवाणी मंडल के अध्यक्ष हैं। मुंबई में इस संस्थान के आसपास बहुत कम शैक्षणिक संस्थान हैं। इस संस्थान में 7 स्कूल, 12 कॉलेज, 62 हजार छात्र और 1900 शिक्षक हैं। इसमें मीठीबाई, नरसी मोनजी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज जैसे बड़े शैक्षणिक संस्थान शामिल हैं। ज्यादातर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बेटे या बेटी का दाखिला इन शैक्षणिक संस्थानों में हो।

यहां से पढ़ाई करने वाले कई बड़े नामों का जिक्र किया जा सकता है। हम छह-सात साल पहले एक कार्यक्रम में मिले थे। मैंने उनसे अपना परिचय दिया। उन्होंने बड़ी दिलचस्पी से मेरे बारे में पूछा। जुहू में एनएनआईएमएस बिल्डिंग में उनका ऑफिस है, जहां उन्होंने मुझे मिलने के लिए बुलाया था। उसके बाद हमारी कई मुलाकातें हुईं। उनकी कार्यशैली देखकर यह आश्चर्य की बात नहीं है कि वे किस तरह कई क्षेत्रों में बेहतरीन काम करते हैं। उन्हें काम, समय और गति के गणित की अच्छी समझ है।

हम सभी के पास एक दिन में 24 घंटे होते हैं, कुछ इस समय में एक नई दुनिया बना लेते हैं, कुछ बमुश्किल ऐसा कर पाते हैं। जो लोग ऐसा कर पाते हैं, मैं उनकी प्रशंसा करता हूं। मैं उन्हें लगातार देखता हूं। उनसे सीखता हूं। मेरे हिसाब से यही शिक्षा है। ऐसी शिक्षा जो हमेशा मेरे जीवन में चार चांद लगाती है।

अमरीश भाई सिर्फ शिक्षण संस्थानों के संरक्षक नहीं हैं, वे खुद एक विश्वविद्यालय हैं। हाल ही में मेरे बेटे विवान ने उनसे मुलाकात की। विवान 18 साल का है, वह पंद्रह साल की उम्र से लिख रहा है और जब उन्हें पता चला कि विवान की दो किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, तो उन्होंने विवान की खूब तारीफ की। विवान के लिए यह एक खूबसूरत अनुभव था।

महाराष्ट्र के शिक्षा क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वाले अमरीश भाई के पास ग्रामीण विकास के लिए एक ठोस विजन है। कृषि को पानी उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने जो ‘शिरपुर पैटर्न’ लागू किया, वह जल संसाधन और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में बहुत सफल रहा है। इस नीति की आधारशिला 2004 में रखी गई थी।

कोविड महामारी के दौरान शिरपुर एजुकेशन सोसाइटी और केलवाणी मंडल दोनों ने यह सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल तकनीक को अपनाया कि छात्रों की शिक्षा बाधित न हो। कोविड के कम होने के बाद भी उन्होंने ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में छात्रों के लिए मुफ्त शिक्षा के लिए विभिन्न पहलों को लागू किया। उन्होंने इसके लिए दिल खोलकर पैसा खर्च किया। दुनिया में बहुत से लोग हैं जिनके पास बहुत पैसा है। हालांकि, ऐसे लोगों की संख्या कम है जिनके पास पैसा है और वे इसे दान करते हैं।

उन्होंने शिक्षा, जल संसाधन, ग्रामीण विकास और राजनीति जैसे सभी क्षेत्रों में काम करते हुए अपनी पहचान बनाई। इस काम का लोगों के जीवन पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ा। उन्होंने जो कुछ भी शुरू किया वह अब काफी प्रसिद्ध हो गया है। मुझे यकीन है कि आने वाले समय में उनके हाथों कुछ और शानदार जरूर होगा।

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