बेबाक बात रखने वाला भावुक व्यक्तिमत्व…

'लोग क्या कहेंगे' इस डर से फैसला लेने में देरी की, बात बेटी की जान पर भी आ सकती है। बेहतर है कि उसे तलाक दिलाकर सम्मान के साथ घर वापस लाया जाए।"

बेबाक बात रखने वाला भावुक व्यक्तिमत्व…

An-emotional-personality-who-speaks-his-mind-without-hesitation!

अभिनेत्री त्विषा शर्मा के भोपाल में हुए संदिग्ध मृत्यु मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा सर्वोच्च न्यायालय मे किया गया अत्यंत आक्रामक और उतना ही भावुक तर्क इन दिनों चर्चा में आ गया है। “तलाकशुदा बेटी, मरी हुई बेटी से कहीं बेहतर होती है”, उनका यह बयान कई माता-पिता के दिलों में घर कर गया है। “जब कोई बेटी बार-बार यह कह रही हो कि, वह ससुराल में ‘नरक यातना’ झेल रही है, तब उसके माता-पिता को उसकी बात को गंभीरता से लेना चाहिए।
‘लोग क्या कहेंगे’ इस डर से फैसला लेने में देरी की, बात बेटी की जान पर भी आ सकती है। बेहतर है कि उसे तलाक दिलाकर सम्मान के साथ घर वापस लाया जाए।” यह बयान सिर्फ एक नामचीन वकील का या देश के सॉलिसिटर जनरल का बयान नहीं है; बल्कि एक पिता का दिल रखने वाले एक संवेदनशील व्यक्ति के ये उद्गार हैं।
मैं तुषार मेहता को पिछले कई सालों से जानता हूं। यह इंसान कमाल  है। उनका शैक्षणिक करियर बेहद शानदार रहा है। गुजरात यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई पूरी करते समय उन्होंने पूरे 5 स्वर्ण पदक जीते थे। 1987 में उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील कृष्णकांत वखारिया के मार्गदर्शन में अपनी प्रैक्टिस शुरू की। 2008 में, 42 वर्ष की आयु में उन्हें ‘सीनियर एडवोकेट’ का दर्जा मिला।
इसके बाद उनकी गुजरात राज्य के ‘एडवोकेट जनरल’ के रूप में नियुक्ति हुई। 2014 में केंद्र सरकार के ‘एडिशनल सॉलिसिटर जनरल’ और अक्टूबर 2018 में उनकी ‘सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया’ के रूप में नियुक्ति हुई। सी.के. दफ्तरी के बाद देश में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले वे दूसरे सॉलिसिटर जनरल बने हैं।
केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए उनके द्वारा किए गए सटीक एवं आक्रामक तर्क हमेशा सुर्खियों में रहे हैं। देश के राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक ढांचे को दिशा देने वाले कई ऐतिहासिक मामलों में अदालत में उनके द्वारा निभाई गई भूमिका उनकी बुद्धिमत्ता की चमक दिखाती है। इसमें मुख्य रूप से कुछ बातों का उल्लेख किया जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली ‘धारा 370’ को हटाने के केंद्र सरकार के फैसले के बाद कई लोगों के पेट में दर्द होने लगा था। इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। अत्यंत संवेदनशील और संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण इस मामले में तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष मजबूती से रखा। यह धारा कैसे अस्थायी प्रकृति की थी और कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय क्यों जरूरी है, यह भूमिका उन्होंने अपने बेहतरीन तर्कों द्वारा अदालत के सामने रखी।
राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद के मुकदमे में भी उन्होंने सरकार का पक्ष इसी तरह प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। मुकदमे की लंबी सुनवाई के दौरान उन्होंने राम जन्मभूमि से जुड़े ऐतिहासिक सबूत और कानूनी संदर्भ इस तरह से रखें कि सरकार का पक्ष मजबूत हुआ और अंततः सत्य की जीत हुई।
शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पहनने को लेकर खड़ा हुआ कर्नाटक का विवाद सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा था। इस मामले में तुषार मेहता ने शैक्षणिक संस्थानों में अनुशासन, यूनिफॉर्म के महत्व और संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाओं पर जो तर्क दिया, वह बेहद स्पष्ट और बेबाक था।
कोरोना महामारी के दौरान देश में लॉकडाउन, ऑक्सीजन की आपूर्ति, स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे और टीकाकरण नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में कई जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं। इस राष्ट्रीय संकट के समय तुषार मेहता ने बिना थके लगातार काम करते हुए अदालत को सरकार के उपायों की जानकारी दी और सरकारी नीतियों का सफल बचाव किया।
देश की अर्थव्यवस्था को खोखला करने वाले आर्थिक अपराधियों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) को मिले अधिकारों का उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने पूरी दृढ़ता से कहा कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) का क्रियान्वयन पूरी तरह से कानून के दायरे में ही किया जा रहा है। जीएसटी विवाद और इनसॉल्वेंसी (IBC) कानूनों से जुड़े कई जटिल कॉर्पोरेट और टैक्स संबंधी मामलों में उन्होंने सरकार को बड़ी सफलता दिलाई।
‘अटैक इज बेस्ट डिफेंस’ (आक्रमण ही सबसे अच्छा बचाव है) उनके तर्कों का मूल मंत्र है, ऐसा मुझे लगता है। उनका यह आक्रामक अंदाज मुझे बेहद पसंद आता है। मीडिया में भी उनका अच्छा-खासा क्रेज है। मार्च 2026 में उन्हें ‘इकोनॉमिक टाइम्स ग्लोबल लीगल अवॉर्ड्स’ में कानूनी क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए ‘Outstanding Contribution to the Legal Profession & Rule of Law’ के अत्यंत प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
तुषार मेहता अदालत में जितने आक्रामक और सटीक होते हैं, व्यक्तिगत जीवन में वे उतने ही जिंदादील और संवेदनशील हैं। न्यायपालिका के मजेदार और मानवीय पहलुओं पर प्रकाश डालने वाली उनकी किताब ‘The Lawful and the Awful’ मुझे खुद बेहद पसंद आई। उनका यह साफ मानना है कि पश्चिमी कानून व्यवस्था का अंधानुकरण न करके भारत की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानूनी व्यवस्था हमारी अपनी संवैधानिक परंपरा पर आधारित होनी चाहिए।
‘एक्स कॉर्प’ (ट्विटर) के खिलाफ मामले में उन्होंने यही रुख अपनाया था। उनका करियर बेहद चमकदार रहा है। सालों से सरकार और अदालत से उनका गहरा संबंध रहा है, फिर भी उनके भीतर जरा भी नीरसता या रूखापन नहीं है। तुषार मेहता यानी ऊर्जा और उत्साह का साक्षात रूप, कड़ी मेहनत करने और हर केस का गहराई से अध्ययन करने की उनकी यह तैयारी नए वकीलों के लिए बेहद प्रेरणादायक है।
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