पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच आपसी रक्षा समझौते (Mutual Defence Agreement) की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देशों के बीच हाल के महीनों में बढ़े सैन्य और कूटनीतिक संपर्क के बाद यह पहल सामने आई है, जिसने दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति में नया सवाल खड़ा किया है की, क्या बांग्लादेश पाकिस्तान की रक्षा कर सकता है?
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने CNN से कहा कि इस्लामाबाद और ढाका ने प्रस्तावित समझौते की विषयवस्तु और मसौदे को अंतिम रूप देने के लिए एक संयुक्त तंत्र बनाया है। यह कदम दोनों देशों के बीच मिलिट्री-टू-मिलिट्री संपर्क और रणनीतिक समन्वय के विस्तार की ओर इशारा करता है।
वरिष्ठ कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, बांग्लादेश का सैन्य प्रतिष्ठान पाकिस्तान के साथ एक रणनीतिक और रक्षा सहयोग समझौते में रुचि दिखा रहा है, जो सऊदी अरब जैसे देशों के साथ पाकिस्तान की रक्षा साझेदारियों के समान हो सकता है। इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए दोनों देशों के सैन्य नेतृत्व के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है।
बीते महीनों में पाकिस्तान और बांग्लादेश के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के नियमित दौरे हुए हैं, जिससे आपसी भरोसा और सहयोग को बल मिला है। इस वर्ष दोनों देशों की थलसेना, वायुसेना और नौसेना के अधिकारियों के बीच कई बैठकें हुईं, जिनके परिणामस्वरूप प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और पेशेवर आदान-प्रदान से जुड़े कई सैन्य समझौता ज्ञापन (MoUs) पर हस्ताक्षर किए गए।
सूत्रों का कहना है कि प्रस्तावित समझौते पर प्रगति लगातार हो रही है, हालांकि अंतिम मसौदा बांग्लादेश के आम चुनावों के बाद तैयार किए जाने की संभावना है। इसके बाद नई सरकार इस समझौते की समीक्षा कर औपचारिक मंजूरी देगी।
व्यापक संदर्भ में देखी जा रहा है की शेख हसीना के तख्तापलट के बाद पाकिस्तान-बांग्लादेश संबंधों में तेजी से सुधार आया है। दोनों देशों ने कूटनीतिक चैनलों और रक्षा सहयोग को पुनः सक्रिय करने की दिशा में तेज़ी से कदम उठाए हैं।
सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है की, कम-से-कम आठ देशों ने पाकिस्तान के साथ इसी तरह के रणनीतिक और आपसी रक्षा समझौतों में रुचि दिखाई है। इससे क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग में पाकिस्तान की भूमिका और उसकी रक्षा कूटनीति के विस्तार का संकेत मिलता है। यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो पाकिस्तान-बांग्लादेश आपसी रक्षा समझौता दशकों में दोनों देशों के बीच सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक घटनाक्रमों में से एक होगा, जिसके दक्षिण एशिया की सुरक्षा गतिशीलता पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।
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