नीलेश मण्डलेवाला ने इस सम्मान को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि न मानकर पूरे देश के अंगदान अभियान को समर्पित किया। उन्होंने अपने पिता की पीड़ा से शुरू हुई अंगदान की आवश्यकता की कहानी को याद करते हुए अंगदान को लेकर किये गए अपने प्रयासों, सामाजिक रुढ़िवादी सोच, लोगो के तिरस्कार से लेकर पद्मश्री सम्मान तक की बात की।
नीलेश मण्डलेवाला ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “मैं मानता हूं कि यह सम्मान नीलेश मण्डलेवाला या सिर्फ ‘डोनेट लाइफ’ का नहीं है।
आजादी के शताब्दी वर्ष को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के विज़न को आगे बढ़ाते हुए मण्डलेवाला ने अपनी संस्था के एक बड़े संकल्प को साझा किया। उन्होंने कहा, “हमने एक मिशन तय किया है कि साल 2047 में जब हमारा देश आजादी की शताब्दी मना रहा होगा, तब भारत में किसी भी मरीज की मौत ‘अंग न मिलने’ की वजह से नहीं होगी।
पद्मश्री मिलने के बाद बढ़ने वाली जिम्मेदारी पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “सम्मान हमेशा अपने साथ बड़ी जवाबदेही लेकर आता है। सही मायनों में यह पुरस्कार तभी सार्थक होगा, जब हम देश के उन राज्यों में भी अंगदान की प्रवृत्ति और ट्रांसप्लांट की सुविधाओं को शुरू करवा सकें, जहां अभी इसकी शुरुआत नहीं हुई है।”
मण्डलेवाला ने कहा, “जब हमारे परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु होती है, तो हम उनके गहने (ऑर्नामेंट्स) उतार लेते हैं, क्योंकि वे कीमती होते हैं। लेकिन हमारे शरीर के अंग (ऑर्गन्स) उन गहनों से भी लाख गुना कीमती हैं, क्योंकि ये किसी फैक्ट्री में नहीं बनते। इन्हें जलाने या दफनाने के बजाय अगर हम दान कर दें, तो देश में हर साल समय पर अंग न मिलने से मरने वाले लाखों लोगों को नया जीवन मिल सकता है।”
नीलेश मण्डलेवाला ने भावुक होकर कहा कि वे इस प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कार को अपने माता-पिता के चरणों में और भगवान द्वारकाधीश के चरणों में अर्पण करते हैं।
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