इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने मिडिल एज के लोगों के खून में अल्जाइमर से जुड़े कुछ खास बायोमार्कर्स की जांच की। इनमें खास तौर पर फॉस्फोराइलेटेड टाऊ और अमाइलॉइड-बीटा जैसे संकेतकों को देखा गया। ये ऐसे प्रोटीन हैं, जिनमें होने वाले बदलाव अल्जाइमर से जुड़ी दिमागी प्रक्रियाओं की ओर इशारा कर सकते हैं।
इस स्टडी में ऐसे लोगों को शामिल किया गया, जो अभी मिडिल एज में थे और जिनमें अल्जाइमर के स्पष्ट लक्षण जरूरी नहीं थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि कुछ लोगों में अल्जाइमर से जुड़ी न्यूरोपैथोलॉजी के संकेत पहले से मौजूद थे। हालांकि, ऐसे मामले आम नहीं थे।
जिन लोगों में ये बायोमार्कर्स अल्जाइमर से जुड़े पाए गए, उनमें सोचने-समझने और याददाश्त से जुड़े कुछ परीक्षणों में अपेक्षाकृत खराब प्रदर्शन देखने को मिला। यह संबंध उम्र, बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई), किडनी की कार्यक्षमता और एपीओई जीन जैसे कई कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी देखा गया।
शोध में यह भी संकेत मिला कि इन संबंधों में लिंग, एपीओई जीन और नस्लीय समूहों के अनुसार अंतर हो सकता है। कुछ विश्लेषणों में ब्लैक प्रतिभागियों, एपीओई 4 जीन वाले लोगों और महिलाओं में संबंध अधिक मजबूत दिखाई दिए, हालांकि यह हर तुलना में एक जैसा नहीं था।
अल्जाइमर की बीमारी के लक्षण सामने आने तक दिमाग में इससे जुड़े बदलाव काफी समय से चल रहे हो सकते हैं। ऐसे में अगर आसान और कम खर्चीले ब्लड टेस्ट से इन बदलावों का संकेत पहले मिल सके, तो भविष्य में डॉक्टरों को जोखिम वाले लोगों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति के लिए सामान्य ब्लड टेस्ट से अभी अल्जाइमर की निश्चित भविष्यवाणी की जा सकती है। यह रिसर्च शुरुआती पहचान की संभावनाओं को मजबूत करती है, लेकिन ऐसे टेस्ट के इस्तेमाल, सटीकता और क्लिनिकल उपयोग को लेकर अभी और अध्ययन की जरूरत है।
फिर भी, स्टडी इस बात को मजबूती देती है कि अल्जाइमर केवल बुढ़ापे में अचानक शुरू होने वाली बीमारी नहीं है। इसके जैविक बदलाव लक्षणों से कई साल पहले शुरू हो सकते हैं।



