वाराणसी में सूदखोरी से मौतें, पीड़ित परिवारों ने लगाई गुहार!

अगर सरकार ने सख्त कदम नहीं उठाए तो यह सूदखोरी का धंधा आने वाले समय में समाज और व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।

वाराणसी में सूदखोरी से मौतें, पीड़ित परिवारों ने लगाई गुहार!

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उत्तर प्रदेश में सूदखोरी का अवैध कारोबार लगातार पांव पसार रहा है। अनुमान है कि यह धंधा करोड़ों रुपये का है, लेकिन इसका कोई ठोस लेखा-जोखा सरकार के पास उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहर तक हर जगह कर्ज पर ऊंचे ब्याज वसूली का खेल जारी है। वाराणसी, जो प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है, वहां इस काले धंधे का जाल तेजी से फैल चुका है।

हाल ही में हुई आत्महत्याओं ने इस समस्या की गंभीरता को उजागर कर दिया है। सोराकुआ इलाके में पश्चिम बंगाल के शुभम सामंत ने सूदखोरों की प्रताड़ना से तंग आकर जहर खाकर जान दे दी। इसी तरह हुकुलगंज निवासी सागर विश्वकर्मा ने फांसी लगाकर खुदकुशी की। मृतक के पिता ने आरोप लगाया कि सूदखोर लगातार धमकियां देकर बेटे को परेशान कर रहे थे।

कृष्णा नगर के संतोष यादव का आरोप है कि सूदखोर सुधीर राय ने ब्याज समेत लाखों रुपये वसूलने के बावजूद साजिशन उन्हें और कर्जदार बना दिया। वहीं, मेदनी सिंह और सूरज वर्मा जैसे कई पीड़ितों ने बताया कि उन्होंने ब्याज समेत रकम चुकाई, लेकिन सूदखोरों ने उनके कागजात लौटाने के बजाय मारपीट और धमकी देकर और पैसा ऐंठा।

स्थानीय वकीलों का कहना है कि उत्तर प्रदेश साहूकारी अधिनियम 1976 और मनी लेंडिंग कंट्रोल एक्ट 1986 के तहत बिना लाइसेंस सूदखोरी करना और मनमाना ब्याज वसूलना अपराध है। इसमें तीन से सात साल की सजा तक हो सकती है। इसके बावजूद पुलिस की कथित मिलीभगत से सूदखोरों का सिंडिकेट बेखौफ काम कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बैंकों से समय पर ऋण न मिल पाने के कारण लोग मजबूरी में इन सूदखोरों के चंगुल में फंस जाते हैं। किसानों से लेकर नौकरीपेशा लोग तक इसका शिकार हो रहे हैं। अदालत ने भी गुंडा बैंकों पर नकेल कसने के लिए एसआईटी बनाने का निर्देश दिया था, लेकिन जमीनी कार्रवाई धीमी है।

स्पष्ट है कि अगर सरकार ने सख्त कदम नहीं उठाए तो यह सूदखोरी का धंधा आने वाले समय में समाज और व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।

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