नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर भारत पहुंच गए हैं। प्रधानमंत्री बलेंद्र “बालेन” शाह के मार्च में सत्ता संभालने के बाद यह किसी नेपाली मंत्री की पहली भारत यात्रा है। ऐसे में इस दौरे को दोनों देशों के बीच हाल के वर्षों में पैदा हुई कड़वाहट को कम करने और संबंधों को नई दिशा देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर विदेश मंत्री खनाल का स्वागत करते हुए कहा, यह दौरा भारत और नेपाल के बीच विशेष साझेदारी को और मज़बूत करने में मदद करेगा।
हाल के वर्षों में भारत और नेपाल के बीच सबसे बड़ा विवाद लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी क्षेत्रों को लेकर रहा है। इन क्षेत्रों पर दोनों देश अपना-अपना दावा करते हैं। हालांकि, दोनों पक्ष इस यात्रा के दौरान सार्वजनिक तौर पर विवादित मुद्दों से दूरी बनाते हुए सकारात्मक एजेंडे पर ध्यान केंद्रित करते दिखाई दे रहे हैं।
भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि सीमा विवाद सहित अन्य मुद्दों के समाधान के लिए दोनों देशों के बीच स्थापित द्विपक्षीय तंत्र मौजूद है और इन्हीं माध्यमों से बातचीत आगे बढ़ाई जाएगी।
यात्रा से पहले जारी बयान में नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, संपर्क, ऊर्जा और लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी। इससे संकेत मिलता है कि काठमांडू फिलहाल सीमा विवाद को प्रमुख विषय बनाने से बचना चाहता है।
हालांकि तनाव कम करने की कोशिशों के बावजूद नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र “बालेन” शाह के हालिया बयान अब भी चर्चा में हैं। उन्होंने नेपाल की संसद में कहा था कि विवादित क्षेत्रों में केवल भारत ने ही नहीं, बल्कि नेपाल ने भी अतिक्रमण किया है। उन्होंने यह भी कहा था कि इस मुद्दे पर नेपाल ने चीन और ब्रिटेन से भी चर्चा की है।
भारत ने इन टिप्पणियों को सकारात्मक रूप से नहीं देखा, क्योंकि नई दिल्ली सीमा विवाद को पूरी तरह द्विपक्षीय मामला मानती है और इसके अंतरराष्ट्रीयकरण का विरोध करती है। सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री बालेन शाह सोमवार को संसद में अपने बयान पर और स्पष्टता दे सकते हैं।
भारत-नेपाल संबंधों के जानकार और देशसंचार डॉट कॉम के संपादक युवराज घिमिरे का मानना है कि बालेन शाह संभवतः सीमा के नो-मैन्स लैंड में बसे अवैध नेपाली बस्तियों की ओर इशारा कर रहे थे। उन्होंने कहा, “वह शायद काली नदी का उल्लेख कर रहे थे, नदी को 1816 की संधि में भारत और नेपाल के बीच सीमा बनाया गया था।”
घिमिरे के अनुसार, नेपाल के भीतर भी बड़ी संख्या में लोग सीमा विवाद के अंतरराष्ट्रीयकरण के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि ब्रिटेन की भूमिका 1816 की संधि से जुड़ी रही थी, इसलिए विशेषज्ञों की राय लेने की बात कही गई होगी।
विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री शाह द्वारा चीन का उल्लेख उस कूटनीतिक पत्र से जुड़ा था, जो नेपाल ने मई में भारत और चीन दोनों को भेजा था। इसमें लिपुलेख मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा दोबारा शुरू करने के प्रस्ताव पर आपत्ति जताई गई थी, क्योंकि नेपाल इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल की विदेश नीति पहले की तुलना में अधिक मुखर होती जा रही है। हालांकि आर्थिक रूप से नेपाल अब भी भारत पर काफी हद तक निर्भर है और वर्ष 2025 में उसके कुल आयात का 64 प्रतिशत तथा निर्यात का 80 प्रतिशत भारत के साथ रहा, लेकिन चीन के बढ़ते प्रभाव और अमेरिका के बढ़ते निवेश ने क्षेत्रीय समीकरणों को बदल दिया है।
राजनयिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि शिशिर खनाल की यह यात्रा किसी बड़े समझौते के बजाय दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली और गलतफहमियों को दूर करने का अवसर साबित हो सकती है। फिलहाल दोनों पक्ष एक-दूसरे की प्राथमिकताओं और रुख को समझने पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।
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