इस स्टडी के नतीजे बताते हैं कि हर 4 में से 1 भारतीय स्तन कैंसर मरीज में बीमारी का कारण वंशानुगत जीन है। आईआईटी की यह रिसर्च बताती है कि भारत में स्तन कैंसर सिर्फ उम्र या जीवनशैली का मामला नहीं है। बड़ी संख्या में मामलों के पीछे खानदानी जीन भूमिका निभा रहे हैं।
अगर समय रहते सही जीन की जांच हो जाए तो बीमारी की रोकथाम संभव है। इलाज ज्यादा सटीक हो सकता है। परिवार के अन्य सदस्यों को पहले से सतर्क किया जा सकता है। यह स्टडी भारत में सटीक चिकित्सा की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
आईआईटी की इस रिसर्च का कहना है कि अगर किसी मरीज में खानदानी जीन वैरिएशन मिलता है तो उसके भाई-बहन, बच्चे और दूसरे रिश्तेदारों में भी वही जोखिम हो सकता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक ऐसे में परिवार के बाकी लोगों की समय रहते जांच की जा सकती है।
इस स्टडी में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है: वह यह कि 21 प्रतिशत से ज्यादा मरीजों में ऐसे जीन बदलाव मिले जो दिल की बीमारी, धमनियों की समस्या या दूसरी गंभीर स्थितियों से जुड़े हैं। करीब 8 प्रतिशत लोग ऐसे आनुवंशिक रोगों के कैरियर निकले जो आगे बच्चों में जा सकते हैं। इसका मतलब है कि एक व्यापक जीन जांच से सिर्फ कैंसर नहीं, बल्कि दूसरी संभावित बीमारियों का भी पता लगाया जा सकता है।
इस शोध में 479 स्तन कैंसर मरीजों के खून से जर्मलाइन डीएनए की जांच की गई। जर्मलाइन का मतलब है वह जीन जो माता-पिता से बच्चों में जाता है। यानी यह पता लगाया गया कि बीमारी सिर्फ जीवनशैली या उम्र की वजह से है, या परिवार से मिला आनुवंशिक जोखिम भी इसमें शामिल है।
वैज्ञानिकों ने एक-दो नहीं बल्कि कुल 97 अलग-अलग जीन की जांच की। अब तक भारत में ज्यादातर जांच सिर्फ बीआरसीए1 और बीआरसीए2 जीन तक सीमित रहती थी, लेकिन इस बार तस्वीर काफी बड़ी निकली। शोधकर्ताओं का मानना था कि सिर्फ बीआरसीए पर ध्यान देना काफी नहीं है।
रिपोर्ट के मुताबिक 24.6 प्रतिशत मरीजों में खतरनाक जीन वैरिएशन मिले। सिर्फ 8.35 फीसदी मामलों में बीआरसीए1 या बीआरसीए2 जिम्मेदार थे। यानी लगभग 67 प्रतिशत मामलों में बीमारी दूसरे जीन से जुड़ी थी। 11.9 प्रतिशत मरीजों में ऐसे जीन प्रभावित थे जो शरीर की डीएनए मरम्मत प्रणाली से जुड़े होते हैं।
सीधी भाषा में समझें तो, अगर कोई महिला सिर्फ बीआरसीए टेस्ट करवा रही है तो वह असली जोखिम का बड़ा हिस्सा मिस कर सकती है। शोध में पाया गया कि कुछ मरीजों में ऐसे जीन वैरिएशन थे जिनकी वजह से आम कीमोथेरेपी दवाएं शरीर में गंभीर दुष्प्रभाव पैदा कर सकती हैं।
यानी अगर पहले से जीन की जानकारी हो तो दवा की मात्रा बदली जा सकती है। वैकल्पिक दवा चुनी जा सकती है। जानलेवा साइड इफेक्ट से बचाव हो सकता है। इससे इलाज ज्यादा सुरक्षित और व्यक्तिगत बन सकता है।
आईआईटी के मुताबिक सबसे अहम बात यह सामने आई कि कई जीन वैरिएशन ऐसे थे जो दुनिया के दूसरे देशों में बहुत कम या नहीं के बराबर मिलते हैं। यानी भारतीयों की आनुवंशिक बनावट अलग है। इसलिए भारत के लिए अलग जीन डेटाबेस की जरूरत है।
इलाज और जांच की गाइडलाइन भी भारतीय आबादी के हिसाब से बननी चाहिए। ऐसे में विदेशी डेटा पर पूरी तरह निर्भर रहना सही नहीं होगा। इस रिसर्च के बाद विशेषज्ञों का कहना है कि बीआरसीए तक सीमित जांच की जगह मल्टी जीन पैनल टेस्ट को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर पर जीन नीति तैयार की जानी चाहिए। सरकारी और निजी अस्पतालों में भी व्यापक जीन जांच सुलभ होनी चाहिए।



