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​सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बैलगाड़ी दौड़ को मिली इजाजत!

​महाराष्ट्र में बैलगाड़ी दौड़, तमिलनाडु में जल्लाकट्टू और कर्नाटक में कम्बाला सभी को तीन संबंधित राज्य सरकारों द्वारा उन राज्यों के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में संशोधित किया गया था। इसके मुताबिक उन राज्यों ने भी इन खेलों को मंजूरी दे दी थी। हालांकि, राज्य सरकार के इन फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

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बैलगाड़ी और जल्लीकट्टू गेम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है जिसका इंतजार महाराष्ट्र पिछले कई महीनों से कर रहा था​| इस संबंध में सुनवाई दिसंबर माह में पूरी हुई थी। फिर फैसला सुरक्षित रख लिया था। आखिरकार आज कोर्ट ने इस संबंध में फैसला सुना दिया है और उसके अनुसार महाराष्ट्र में बैलगाड़ी दौड़, तमिलनाडु में जल्लीकट्टू और कर्नाटक में कंबाला को अनुमति दे दी गई है​|जानवरों के अनुकूल संगठनों द्वारा याचिका दायर की गई थी जिसमें दावा किया गया था कि इस तरह के खेलों में जानवर पीड़ित हैं। कोर्ट ने आखिरकार अपना फैसला सुना दिया है।
​महाराष्ट्र में बैलगाड़ी दौड़, तमिलनाडु में जल्लाकट्टू और कर्नाटक में कम्बाला सभी को तीन संबंधित राज्य सरकारों द्वारा उन राज्यों के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में संशोधित किया गया था। इसके मुताबिक उन राज्यों ने भी इन खेलों को मंजूरी दे दी थी। हालांकि, राज्य सरकार के इन फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। इस संबंध में विस्तृत सुनवाई के बाद दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। फाइनली आज रिजल्ट आ ही गया|
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों द्वारा पारित कानूनों को चुनौती देने वाली याचिका आज खारिज कर दी। यह 2014 में सुप्रीम कोर्ट था जिसने जल्लीकट्टू और इसी तरह के खेलों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था। उसके बाद राज्य सरकारों ने इस कानून में संशोधन कर नया विधेयक पारित किया।
कोर्ट ने क्या कहा?: कोर्ट ने इस संबंध में कानून में संशोधन के राज्य सरकारों के अधिकार को स्वीकार किया. “तमिलनाडु में जल्लीकट्टू एक सदी से अधिक समय से चल रहा है। यह अदालत को तय नहीं करना है कि खेल तमिलनाडु की संस्कृति का हिस्सा है या नहीं। अगर विधायिका ने फैसला किया है कि जल्लीकट्टू तमिलनाडु की संस्कृति का हिस्सा है, तो न्यायपालिका अलग रुख नहीं अपना सकती है। इस संबंध में निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार विधायिका के पास है।​ ​यही बात महाराष्ट्र में बैलगाड़ी दौड़ और कर्नाटक में कम्बाला पर भी लागू होती है,” अदालत ने उस समय कहा था।
राजनीतिक हलकों से बधाई प्रतिक्रियाएं: सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला महाराष्ट्र के किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला है। गांवों में देशी खिलार बैलों को मुख्य रूप से दौड़ में चलाया जाता है। इस बीच दौड़ बंद होने के कारण हजारों बैल कत्लखाने में चले गए। बकरे की कीमत ज्यादा थी, लेकिन बैल की सूंड की कीमत कम थी। मैं इस फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद देता हूं|
भाजपा विधायक गोपीचंद पडलकर ने कहा की राकांपा सांसद अमोल कोल्हे ने कहा​ कि यह बड़े हर्ष का विषय है। कई साल से बैलगाड़ी मालिकों ने यह लड़ाई लड़ी है। यह सबकी सफलता है। मैं सरकार का भी हृदय से आभार व्यक्त करता हूं। मवि​ ​की सरकार के दौरान तत्कालीन पशुपालन मंत्री सुनील केदार ने हिरीरी की पहल पर इस मामले को खड़ा करने की कोशिश की थी|​​ पहले चरण में शर्तों के साथ अनुमति दी गई थी​|​
 
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