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Friday, October 30, 2026
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निर्यात के आंकडे बता रहें टेर्रिफ नहीं बन पाया भारत की गहरी चिंता !

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भारत के निर्यात के आँकड़े इस बात का संकेत दे रहे हैं कि अमेरिकी टैरिफ़ को लेकर जताई जा रही चिंताएं फिलहाल उतनी गहरी नहीं हैं, जितना पहले अनुमान लगाया जा रहा था। वैश्विक व्यापार में सुस्ती और संरक्षणवादी नीतियों के बीच भी भारत का निर्यात प्रदर्शन अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है, जो नई दिल्ली की बदलती व्यापार रणनीति की ओर इशारा करता है।

दिसंबर में भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 25.04 अरब डॉलर पर पहुँच गया, जिसका प्रमुख कारण आयात में बढ़ोतरी रहा। इसके बावजूद दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाज़ार अमेरिका को होने वाले निर्यात में कोई बड़ी गिरावट नहीं हुई, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अगस्त के अंत से कुछ भारतीय उत्पादों पर टैरिफ़ बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिए थे।

इन टैरिफ़ बढ़ोतरी का असर कपड़ा, रसायन और कुछ खाद्य उत्पादों के निर्यात पर पड़ा, लेकिन समग्र निर्यात प्रवाह बाद के महीनों में स्थिर होता दिखा। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने संवाददाताओं से कहा, “वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में अमेरिका को निर्यात सालाना आधार पर बढ़ा है।” उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मार्च में समाप्त होने वाले चालू वित्त वर्ष में भारत का कुल निर्यात 850 अरब डॉलर से अधिक हो सकता है।

भारत लंबे समय से खुद को एक वैश्विक निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी टैरिफ़ के संभावित प्रभाव को कम करने के लिए सरकार ने बाज़ारों और उत्पादों दोनों के स्तर पर विविधीकरण की रणनीति को तेज़ किया है। इसका असर हालिया आँकड़ों में साफ़ दिखाई देता है।

चीन के साथ समीकरणों में बदलाव, नए बाज़ारों की तलाश

निर्यात आँकड़े यह भी दर्शाते हैं कि भारत के व्यापारिक भूगोल में एक महत्वपूर्ण बदलाव आ रहा है। चीन भारत के सबसे तेज़ी से बढ़ते निर्यात स्थानों में शामिल हो गया है। अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच भारत-चीन व्यापार 110.20 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जबकि इसी अवधि में अमेरिका के साथ व्यापार 105.31 अरब डॉलर रहा।

चीन के अलावा संयुक्त अरब अमीरात, हांगकांग, स्पेन और अन्य उभरते बाज़ारों में भी भारतीय निर्यात में मज़बूत वृद्धि दर्ज की गई है। यह रुझान इस बात को रेखांकित करता है कि भारत अब कुछ गिने-चुने पारंपरिक साझेदारों पर निर्भर रहने के बजाय अपने व्यापारिक दायरे को व्यापक बना रहा है।

अफ्रीका को भी तेजी से एक प्रमुख विकासशील बाज़ार के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय दवा उद्योग, इंजीनियरिंग सामान और उपभोक्ता उत्पादों के लिए यह महाद्वीप नई संभावनाएँ खोल रहा है, जिससे अमेरिका जैसे एकल बाज़ार पर निर्भरता घटाने में मदद मिल रही है।

कुल मिलाकर, ये आँकड़े भारत की व्यापार नीति में एक शांत लेकिन महत्वपूर्ण पुनर्संतुलन की ओर इशारा करते हैं। टैरिफ़ के जवाब में रक्षात्मक रुख अपनाने के बजाय, नई दिल्ली एशिया, पश्चिम एशिया और अफ्रीका में जोखिम फैलाकर दीर्घकालिक स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है।

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