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भारत का ‘गोल्ड’ दांव: अमेरिकी ट्रेजरी में कटौती, सोने में निवेश की बढ़ोतरी!

आरक्षित भंडार रणनीति में बड़ा बदलाव

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भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार प्रबंधन में एक नया संतुलन तलाश रहा है। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने अमेरिकी ट्रेजरी बिल्स (USTs) पर निर्भरता कम करते हुए सोने की खरीद को तेज़ किया है। यह कदम डॉलर-प्रधान वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से आंशिक दूरी बनाने और जोखिमों को कम करने की दिशा में उठाया गया माना जा रहा है।

यूएस डिपार्टमेंट ऑफ ट्रेजरी और RBI के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, जून 2025 में भारत की अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स घटकर 227 अरब डॉलर रह गईं, जबकि जून 2024 में यह 242 अरब डॉलर थीं। इसके बावजूद भारत अभी भी अमेरिकी कर्ज में निवेश करने वाले शीर्ष 20 देशों में शामिल है और सऊदी अरब तथा जर्मनी जैसे देशों से आगे है। कुल 690 अरब डॉलर के भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा अब भी डॉलर एसेट्स से जुड़ा है, लेकिन इसकी हिस्सेदारी धीरे-धीरे कम हो रही है।

डॉलर एसेट्स में कटौती के समानांतर भारत ने सोने के भंडार में तेज़ी से इज़ाफा किया है। बीते साल RBI ने 39.22 मीट्रिक टन सोना खरीदा, जिससे जून 2024 में 840.76 मीट्रिक टन का भंडार बढ़कर जून 2025 तक 879.98 मीट्रिक टन पर पहुंच गया। यह हालिया वर्षों में सबसे बड़ी सालाना वृद्धि में से एक है।

सोने को सुरक्षित निवेश इसलिए माना जाता है क्योंकि यह मुद्रा में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के दौर में मूल्य को स्थिर रखता है। पिछले दो वर्षों में डॉलर की सोने के मुकाबले कीमत लगभग 40% गिर गई है, जिससे डॉलर का रिज़र्व करंसी के रूप में भरोसा कमजोर हुआ है। ऐसे माहौल में भारत का यह रुझान सोने को दीर्घकालिक ‘सेफ एसेट’ मानने की पुष्टि करता है।

भारत का यह कदम वैश्विक प्रवृत्तियों का हिस्सा है। चीन, जो जापान और ब्रिटेन के बाद अमेरिकी ट्रेजरी का तीसरा सबसे बड़ा धारक है, उसने भी अपनी होल्डिंग्स घटाकर 756 अरब डॉलर कर दी है, जो पिछले वर्ष 780 अरब डॉलर थी। वहीं, कुछ देश जैसे इज़राइल अपने निवेश बढ़ा रहे हैं, जिससे स्पष्ट है कि विभिन्न देशों की रणनीतियाँ अलग-अलग हैं—कुछ तरलता को प्राथमिकता देते हैं, जबकि कुछ डॉलर-विशिष्ट जोखिमों से बचाव को अहम मानते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह कदम केवल तात्कालिक लाभ से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक जोखिम प्रबंधन से प्रेरित है। अमेरिका के बढ़ते राजकोषीय दबाव, ऊंची बॉन्ड यील्ड्स और भू-राजनीतिक तनावों ने डॉलर-निर्भरता को और जोखिमपूर्ण बना दिया है। सोने पर भरोसा इसी रणनीतिक संतुलन का हिस्सा है।

हालांकि भारत ने डॉलर पर निर्भरता घटाने की दिशा में पहल की है, लेकिन 227 अरब डॉलर की अमेरिकी ट्रेजरी और करीब 690 अरब डॉलर का कुल भंडार यह दिखाता है कि देश अब भी पर्याप्त ‘डॉलर कुशन’ बनाए हुए है। सोना भले ही कोई प्रत्यक्ष ब्याज न देता हो, लेकिन इसे दीर्घकालिक सुरक्षा और स्थिरता के लिए अहम माना जा रहा है।

भारत का यह बदलाव केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि एक ठोस संरचनात्मक कदम है। यदि मौजूदा रुझान जारी रहते हैं तो आने वाले वर्षों में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी और बढ़ेगी और डॉलर-आधारित एसेट्स पर निर्भरता धीरे-धीरे घटेगी। यह न सिर्फ भारत की आर्थिक स्थिरता को मज़बूत करेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में बदलते समीकरणों को भी दर्शाएगा।

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