भारत और अमेरिका के बीच जेट इंजन निर्माण सहयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। अमेरिकी कंपनी GE एयरोस्पेस और भारत की सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने F414 जेट इंजन के सह-उत्पादन के लिए एक अहम तकनीकी समझौता अंतिम रूप दे दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस करार में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (टेक्नोलॉजी ट्रांसफर) भी शामिल है, जो भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता को मजबूत करेगा।
करीब तीन वर्षों की बातचीत के बाद यह समझौता संभव हो पाया है। दोनों कंपनियों ने पुष्टि की है कि तकनीकी पहलुओं पर सहमति बन गई है, जिससे अंतिम अनुबंध का रास्ता साफ हो गया है।
तकनीकी हस्तांतरण पर जोर
इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अत्याधुनिक जेट इंजन तकनीक का भारत को हस्तांतरण है। विशेषज्ञों के अनुसार, उन्नत जेट इंजन निर्माण लंबे समय से भारत के लिए एक तकनीकी चुनौती रहा है। इस करार के जरिए देश में उच्च क्षमता वाले इंजन के निर्माण की नींव मजबूत होगी।
अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को मिलेगी ताकत
F414 इंजन भारत के स्वदेशी रूप से विकसित हो रहे अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों में लगाए जाएंगे। भारत की योजना 120 से 130 ऐसे विमानों को शामिल करने की है, जो पुराने रूसी मूल के विमानों की जगह लेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब भारत अपनी वायु शक्ति को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। पाकिस्तान और चीन से जुड़े सुरक्षा चुनौतियों के बीच आधुनिक लड़ाकू विमानों और इंजन तकनीक का विकास रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत फ्रांस, जापान और ब्रिटेन जैसे देशों के साथ भी जेट इंजन सहयोग की संभावनाएं तलाश रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत अपनी रक्षा साझेदारियों को विविध और मजबूत बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।विश्लेषकों का कहना है कि GE और HAL के बीच यह करार भारत की ‘आत्मनिर्भर रक्षा’ नीति को गति देगा और देश को वैश्विक रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा।
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