सिरदर्द, नींद न आना, पेट खराब रहना, थकान, चिड़चिड़ापन और दिल की धड़कन तेज होना ये सब संकेत हैं कि मन की उलझनें अब शरीर को लाचार बनाने लगी हैं।
आयुर्वेद मानता है कि मन और शरीर अलग-अलग नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। मन में असंतुलन होता है तो शरीर के दोष (वात, पित्त और कफ) भी बिगड़ने लगते हैं। लगातार चिंता और डर से वात दोष बढ़ता है, जिससे घबराहट, अनिद्रा और जोड़ों में दर्द होने लगता है।
गुस्सा और तनाव पित्त को बढ़ाते हैं, जिससे एसिडिटी, हाई ब्लड प्रेशर और त्वचा की समस्याएं पैदा होती हैं। वहीं उदासी और सुस्ती कफ को बढ़ाकर मोटापा, सुस्ती और कमजोर पाचन का कारण बनती हैं। इसलिए आयुर्वेद में इलाज की शुरुआत शरीर से नहीं, बल्कि मन को शांत करने से की जाती है।
मन को संतुलित रखने के लिए आयुर्वेद सबसे पहले दिनचर्या सुधारने पर जोर देता है। सुबह जल्दी उठना, सूरज की रोशनी में कुछ देर टहलना और दिन की शुरुआत गहरी सांसों के साथ करना मन को हल्का करता है। रोज 10-15 मिनट तिल या नारियल तेल से सिर और पैरों की मालिश करने से नर्वस सिस्टम शांत होता है और तनाव कम महसूस होता है।
आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां भी तनाव से लड़ने में बहुत मददगार हैं। अश्वगंधा शरीर को मानसिक दबाव के अनुकूल बनाती है और थकान दूर करती है। ब्राह्मी और शंखपुष्पी याददाश्त सुधारने के साथ मन को शांत करती हैं। तुलसी और गिलोय की चाय रोज पीने से मन के साथ-साथ इम्यून सिस्टम भी मजबूत होता है। इसके अलावा योग और प्राणायाम जैसे अनुलोम-विलोम, भ्रामरी और शवासन मन को गहरी शांति देते हैं और बेचैनी को धीरे-धीरे कम करते हैं।
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