नेपाल में जारी राजनीतिक अशांति और हिंसक प्रदर्शनों के बीच गुरुवार (12 सितंबर)को काठमांडू के पास भारतीय श्रद्धालुओं से भरी एक बस पर उपद्रवियों ने हमला कर दिया। आंध्र प्रदेश से आए श्रद्धालु पशुपतिनाथ मंदिर के दर्शन कर लौट रहे थे, जब बस पर पत्थरबाजी की गई। हमलावरों ने बस के शीशे तोड़ दिए और यात्रियों का सामान लूट लिया। इस घटना में सात से आठ यात्री घायल हो गए। बस उत्तर प्रदेश नंबर प्लेट से पंजीकृत थी।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हमलावरों ने अचानक बस को निशाना बनाया और पूरी तरह तोड़फोड़ मचाई। बस चालक ने बताया, “हमलावरों ने पत्थरों से सभी शीशे तोड़ डाले और हमारे सामान लूट लिए।” फंसे हुए यात्रियों को बाद में नेपाली सेना के जवानों ने सुरक्षित बाहर निकाला। इसके बाद भारतीय सरकार ने सभी श्रद्धालुओं को एयरलिफ्ट कर दिल्ली पहुंचाया।
भारत सरकार की एडवाइजरी
नेपाल में हालात बिगड़ते देख भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने भारतीय नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है। मंत्रालय ने कहा है कि जब तक हालात सामान्य न हों, भारतीय नागरिक नेपाल की यात्रा टाल दें। वहीं, नेपाल में पहले से मौजूद भारतीयों को सलाह दी गई है कि वे अपने ठिकानों पर ही रहें, सड़कों पर निकलने से बचें और पूरी सावधानी बरतें।
इससे पहले 10 सितंबर को भारतीय एंकर उपासना गिल का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें उन्होंने पोखरा में फंसे होने की जानकारी दी थी। गिल महिला वॉलीबॉल लीग की मेजबानी के लिए नेपाल गई थीं। उन्होंने बताया कि जिस होटल में वे ठहरी थीं, उसे भी उपद्रवियों ने निशाना बनाया और आग के हवाले कर दिया।
नेपाल में बढ़ रहा है संकट
नेपाल में चल रहे Gen Z प्रोटेस्ट के कारण हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। द हिमालयन टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनों में अब तक 34 लोगों की मौत हो चुकी है और 1,300 से अधिक घायल हुए हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि 949 घायलों का इलाज कर उन्हें घर भेज दिया गया है।
गुरुवार(12 सितंबर) को प्रदर्शनकारियों ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में समर्थन देने की घोषणा की। यह घटनाक्रम मौजूदा प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद सामने आया, जिन्होंने देशभर में बढ़ते प्रदर्शनों और हिंसा के चलते पद छोड़ दिया।
सोमवार को नेपाल सरकार द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाने के युवा सड़कों पर निकले, सोशल मीडिया बहाली के लिए निकले प्रदर्शन देखते ही देखते तख्तापलट में बदल गए। हालांकि बाद में यह प्रतिबंध हटा लेने के बावजूद प्रदर्शन रुकने के बजाय और तेज हो गए है, जिससे नेपाल राजनीतिक और सामाजिक संकट में डूब गया है।
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