28.4 C
Mumbai
Monday, August 10, 2026
होमदेश दुनियासात साल की उम्र से सुरों के उस्ताद थे पंडित लालमणि मिश्र!

सात साल की उम्र से सुरों के उस्ताद थे पंडित लालमणि मिश्र!

उन्होंने अपनी साधना और प्रयोगों के जरिए भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई दिशा दी और 'मिश्रवाणी' जैसी खास शैली विकसित की।

Google News Follow

Related

भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने सिर्फ संगीत नहीं साधा, बल्कि अपनी मेहनत, लगन और शोध से संगीत को नई पहचान भी दी। पंडित लालमणि मिश्र भी ऐसे ही महान संगीतज्ञ थे। महज सात साल की उम्र में उनकी संगीत प्रतिभा ने बड़े-बड़े संगीतज्ञों को हैरान कर दिया था।
इतनी कम उम्र में संगीत की कई विधाओं पर उनकी पकड़ थी और आगे चलकर उन्होंने करीब 1500 से ज्यादा ध्रुपद और बंदिशें कंठस्थ कर ली थीं। उन्होंने अपनी साधना और प्रयोगों के जरिए भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई दिशा दी और ‘मिश्रवाणी’ जैसी खास शैली विकसित की।

पंडित लालमणि मिश्र का जन्म 11 अगस्त 1924 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता रघुवंशी लाल मिश्र कानपुर के चौक इलाके में मिठाई की दुकान चलाते थे, जबकि उनकी मां रानी देवी थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन घर में संगीत के प्रति लगाव जरूर था। शायद यही वजह थी कि बचपन से ही लालमणि के मन में सुरों के लिए एक अलग ही प्रेम पैदा हो गया।

जब वह करीब सात साल के थे, तब उनकी मां को संगीत सिखाने के लिए कथाकार पंडित गोवर्धन लाल घर आया करते थे। छोटा सा लालमणि चुपचाप बैठकर संगीत की बारीकियां सुना करता था। एक दिन उसने करीब 15 दिनों तक अपनी मां को सिखाए गए संगीत के पाठ को हारमोनियम पर लगभग उसी तरह दोहरा दिया।

यह देखकर गोवर्धन लाल भी हैरान रह गए। उन्हें समझ आ गया कि इस बच्चे में कोई असाधारण प्रतिभा है। इसके बाद उन्होंने लालमणि के माता-पिता से कहा कि इस बच्चे को संगीत की विधिवत शिक्षा जरूर दिलाई जानी चाहिए।

इसके बाद लालमणि मिश्र ने अलग-अलग गुरुओं से संगीत की कई विधाएं सीखीं। उन्होंने उस्ताद मेहंदी हुसैन खां और रामकृष्ण मिश्र से ख्याल गायन की शिक्षा ली। श्याम बाबू से तबला सीखा और बालकृष्ण मिश्र व शुकदेव राय से सितार की बारीकियां सीखीं। ध्रुपद-धमार जैसी कठिन और गंभीर गायन शैली की शिक्षा भी उन्होंने बड़े गुरुओं से हासिल की।

उनकी प्रतिभा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महज 10 साल की उम्र में उन्हें संगीत की महफिलों में गाने के लिए बुलाया जाने लगा था। उनकी आवाज में मिठास थी, लेकिन उससे भी ज्यादा खास था संगीत पर उनका गहरा नियंत्रण। ध्रुपद गाते समय उनकी लय और गणितीय संरचना इतनी मजबूत होती थी कि मृदंग और तबला वादक भी हैरान रह जाते थे।

संगीत उनके लिए सिर्फ मंच पर तालियां बटोरने का माध्यम नहीं था, बल्कि जीवन की साधना थी। महज 16 साल की उम्र में वह बिहार के मुंगेर जिले के एक रईस परिवार के बच्चों को संगीत सिखाने लगे थे। इसके बाद 1944 में उन्हें कानपुर के कान्यकुब्ज कॉलेज में संगीत शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया।

यही वह दौर था, जब उनकी रुचि दुर्लभ वाद्ययंत्र विचित्र वीणा की ओर बढ़ी। पटियाला के प्रसिद्ध विचित्र वीणा वादक उस्ताद अब्दुल अजीज खां से प्रभावित होकर उन्होंने इस वाद्य की शिक्षा ली। 1950 में लखनऊ में आयोजित भातखंडे जयंती समारोह में जब उन्होंने वीणा वादन किया, तो वहां मौजूद विद्वान और संगीत प्रेमी उनके कौशल से प्रभावित हुए।

पंडित लालमणि मिश्र का संगीत सफर भारत तक सीमित नहीं रहा। 1951 में उन्हें महान नृत्य निर्देशक उदय शंकर के दल का संगीत निर्देशक बनाया गया। अगले कई वर्षों तक उन्होंने इस दल के साथ भारत ही नहीं, बल्कि श्रीलंका, इंग्लैंड, फ्रांस, बेल्जियम, अमेरिका और कनाडा जैसे देशों की यात्राएं कीं। इस दौरान भारतीय संगीत की खुशबू दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंची।

बाद में वह कानपुर के गांधी संगीत महाविद्यालय के प्रधानाचार्य बने। 1958 में पंडित ओंकारनाथ ठाकुर के आमंत्रण पर वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय से जुड़े। यहां उन्होंने वाद्य संगीत विभाग में शिक्षक के रूप में काम किया और आगे चलकर विभागाध्यक्ष और डीन जैसे महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे।

17 जुलाई 1979 को सिर्फ 55 साल की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी सुरमयी विरासत आज भी जिंदा है।

यह भी पढ़ें- 
National Stock Exchange

लेखक से अधिक

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

Star Housing Finance Limited

हमें फॉलो करें

150,761फैंसलाइक करें
526फॉलोवरफॉलो करें
327,000सब्सक्राइबर्ससब्सक्राइब करें

अन्य लेटेस्ट खबरें