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Friday, October 30, 2026
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सुप्रीम कोर्ट: दुष्कर्म के प्रयास वाले मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी पर लगाई फटकार !

सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता की ओर से भेजे गए पत्र के आधार पर संज्ञान लिया गया है, जो एनजीओ 'वी द वूमन ऑफ इंडिया' की संस्थापक भी हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस निर्णय का स्वतः संज्ञान ​लेते​ हुए कोर्ट को जमकर फटकार भी लगाई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि नाबालिग लड़की के स्तनों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करना बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के अपराध के अंतर्गत नहीं आता।

​बता दें कि मामले को आज जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा। ​सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता की ओर से भेजे गए पत्र के आधार पर संज्ञान लिया गया है, जो एनजीओ ‘वी द वूमन ऑफ इंडिया’ की संस्थापक भी हैं।

अभियोजन पक्ष का मामला यह है कि आरोपी व्यक्तियों, पवन और आकाश ने 11 वर्षीय पीड़िता के स्तनों को पकड़ा और उनमें से एक, आकाश ने उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ दिया और उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास किया।

यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम, 2012 के दायरे में बलात्कार के प्रयास या यौन उत्पीड़न के प्रयास का मामला पाते हुए, संबंधित ट्रायल कोर्ट ने ​पॉक्सो अधिनियम की धारा 18 (अपराध करने का प्रयास) के साथ धारा 376 को लागू किया और इन धाराओं के तहत समन आदेश जारी किया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इसके बजाय निर्देश दिया कि आरोपी पर धारा 354-बी आईपीसी (नंगा करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) के मामूली आरोप के तहत मुकदमा चलाया जाए, जिसे ​पॉक्सो अधिनियम की धारा 9/10 (गंभीर यौन उत्पीड़न) के साथ पढ़ा जाए। इस आदेश ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया, जिसमें जनता के कई सदस्यों ने इसकी आलोचना की।

इस मामले में, हाईकोर्ट ने तैयारी और प्रयास के बीच अंतर किया।​ जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने 3 आरोपियों द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कहा,

“आरोपी पवन और आकाश के खिलाफ लगाए गए आरोप और मामले के तथ्य शायद ही मामले में बलात्कार के प्रयास का अपराध बनाते हैं। बलात्कार के प्रयास का आरोप लगाने के लिए अभियोजन पक्ष को यह स्थापित करना होगा कि यह तैयारी के चरण से आगे निकल गया था। तैयारी और अपराध करने के वास्तविक प्रयास के बीच का अंतर मुख्य रूप से दृढ़ संकल्प की अधिक डिग्री में निहित है,”

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस पीबी वराले की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाल ही में लोकस के आधार पर आदेश को चुनौती देने वाली अनुच्छेद 32 रिट याचिका को खारिज कर दिया था।

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