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विश्व के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में शुरू हुआ था एयरफोर्स का ‘ऑपरेशन सफेद सागर’!

कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने लगभग 5,000 स्ट्राइक मिशन, 350 टोही व ईएलआईएनटी मिशन और लगभग 800 एस्कॉर्ट उड़ानें भरी थीं।

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26 मई 1999 को भारतीय सैन्य इतिहास में एक निर्णायक अध्याय की शुरुआत हुई, जब भारतीय वायुसेना ने कारगिल युद्ध के दौरान ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ शुरू किया था। यह अभियान भारतीय सेना के ‘ऑपरेशन विजय’ के समर्थन में चलाया गया था। ‘ऑपरेशन विजय’ का उद्देश्य कारगिल में भारतीय क्षेत्र पर कब्जा जमाए बैठे पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों को खदेड़ना था।

कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने लगभग 5,000 स्ट्राइक मिशन, 350 टोही व ईएलआईएनटी मिशन और लगभग 800 एस्कॉर्ट उड़ानें भरी थीं। यही नहीं, भारतीय वायुसेना ने घायलों को निकालने और हवाई परिवहन कार्यों के लिए 2,000 से अधिक हेलीकॉप्टर उड़ानें भी भरी थीं। 152 हेलीकॉप्टर यूनिट, ‘द माइटी आर्मर’, ने कारगिल युद्ध में ऑपरेशन सफेद सागर के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

आपरेशन सफेद सागर के तहत 28 मई 1999 को, 152 एचयू के स्क्वाड्रन लीडर आर पुंडीर, फ्लाइट लेफ्टिनेंट एस मुहिलान, सार्जेंट पीवीएनआर प्रसाद और सार्जेंट आरके साहू को टोलोलिंग में दुश्मन के ठिकानों पर लाइव स्ट्राइक के लिए ‘नुबरा’ फॉर्मेशन के रूप में उड़ान भरने की जिम्मेदारी दी गई थी। इस हवाई हमले को सफलतापूर्वक करने के बाद, उनके हेलीकॉप्टर से दुश्मन की स्टिंगर मिसाइल टकराई।

इस हमले में चार वीर सैनिकों ने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। असाधारण साहस के इस कार्य के लिए, उन्हें मरणोपरांत वायु सेना पदक (वीरता) से सम्मानित किया गया। उनके सर्वोच्च बलिदान ने सुनिश्चित किया कि उनका नाम हमेशा के लिए भारतीय वायुसेना के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा।

कारगिल युद्ध एक कठिन चुनौती था। दुश्मन ने ऊंची बर्फीली चोटियों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में छिपकर भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की थी। ऐसे हालात में भारतीय वायुसेना को अभियान में शामिल किया गया और 26 मई 1999 को ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ आधिकारिक रूप से शुरू हुआ।

भारतीय वायुसेना ने बड़े स्तर पर अत्यधिक ऊंचाई वाले युद्धक्षेत्र में लड़ाकू विमानों का उपयोग किया। कारगिल की ऊंची पहाड़ियों, बर्फीली हवा, कठिन मौसम और सीमित लक्ष्य दृश्यता ने इस अभियान को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया था।

इसके बावजूद भारतीय वायुसेना ने अदम्य साहस, सटीक रणनीति और उच्च पेशेवर क्षमता का प्रदर्शन किया। अभियान के दौरान मिग-21, मिग-23, मिग-27 और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों का उपयोग किया गया।

विशेष रूप से मिराज-2000 विमानों ने दुश्मन के बंकरों और सप्लाई ठिकानों पर सटीक हमला कर युद्ध की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऊंचाई पर स्थित दुश्मन के ठिकानों पर लेजर-निर्देशित बमों से किए गए हमले भारतीय वायुसेना की तकनीकी क्षमता और युद्धक दक्षता का प्रतीक बने।

‘ऑपरेशन सफेद सागर’ ने न केवल दुश्मन की आपूर्ति और गतिविधियों को भारी नुकसान पहुंचाया, बल्कि भारतीय सेना की अग्रिम कार्रवाई को भी मजबूती प्रदान की। वायु और थल सेनाओं के समन्वित प्रयासों ने भारत को कारगिल युद्ध में सफलता दिलाई।

यह अभियान भारतीय वायुसेना के साहस, बलिदान और पेशेवर उत्कृष्टता का प्रतीक माना जाता है। कठिनतम परिस्थितियों में भी देश की संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा के लिए भारतीय सैनिकों के समर्पण ने पूरे राष्ट्र को गर्व से भर दिया।

‘ऑपरेशन सफेद सागर’ आज भी भारतीय सैन्य इतिहास में वायु शक्ति के प्रभावी और निर्णायक उपयोग के रूप में याद किया जाता है। भारतीय वायुसेना के पास अपने वीर वायु योद्धाओं के साहस और बलिदान की एक गौरवशाली विरासत है। एक ऐसी ही गौरवशाली विरासत वर्ष 1999 का कारगिल युद्ध है जो अदम्य साहस से लड़ा गया था।

कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना का ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ काफी महत्वपूर्ण रहा। ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ 16,000 फीट से अधिक की खड़ी ढलान और चक्करदार ऊंचाइयों की चुनौतियों का सामना करने की भारतीय वायुसेना की सैन्य क्षमता का प्रमाण है।

दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में लड़े गए इस युद्ध को जीतने के लिए वायु शक्ति के अपने उपयोग में तेजी से किए गए तकनीकी संशोधनों और ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग ने भारतीय वायुसेना का स्थान श्रेष्ठ रहा। इस अवसर पर भारतीय वायुसेना ने कहा, “26 मई 1999 को कारगिल संघर्ष के दौरान भारतीय वायुसेना का ऐतिहासिक हवाई अभियान ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ ऑपरेशन विजय के समर्थन में शुरू किया गया था।

इस ऑपरेशन का उद्देश्य कारगिल सेक्टर में नियंत्रण रेखा के साथ भारतीय चौकियों पर कब्जा जमाए पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों को खदेड़ना था। दुनिया के सबसे कठिन व उच्च हिमालयी युद्ध क्षेत्रों में संचालित ऑपरेशन ने भारतीय वायुसेना के साहस, सटीकता और पेशेवर क्षमता का परिचय दिया तथा राष्ट्र की सुरक्षा में वायु शक्ति की निर्णायक भूमिका को फिर से स्थापित किया।”
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