वयस्क मस्तिष्क में नए न्यूरॉन बनना फायदेमंद नहीं, नुकसानदायक भी हो सकता

मानव शरीर हर दिन अरबों कोशिकाओं को बदलता रहता है। पुरानी कोशिकाएं नष्ट होती हैं और उनकी जगह नई, स्वस्थ कोशिकाएं बनती हैं।

वयस्क मस्तिष्क में नए न्यूरॉन बनना फायदेमंद नहीं, नुकसानदायक भी हो सकता

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गीत गाने वाले पक्षियों (सॉन्गबर्ड्स) पर किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने मस्तिष्क के कामकाज को लेकर एक चौंकाने वाला पहलू सामने रखा है। यह शोध इस बात को समझने में मदद करता है कि इंसान वयस्क होने के बाद बड़ी संख्या में नई मस्तिष्क कोशिकाएं​-यानी न्यूरॉन​- क्यों नहीं बना पाते।

मानव शरीर हर दिन अरबों कोशिकाओं को बदलता रहता है। पुरानी कोशिकाएं नष्ट होती हैं और उनकी जगह नई, स्वस्थ कोशिकाएं बनती हैं। उदाहरण के तौर पर, लाल रक्त कोशिकाएं लगभग चार महीने तक जीवित रहती हैं, त्वचा की कोशिकाएं करीब एक महीने में बदल जाती हैं, जबकि आंतों की परत की कोशिकाएं कुछ ही दिनों में नवीनीकरण हो जाती हैं। लेकिन इस निरंतर बदलाव के बीच एक अंग ऐसा है, जहां नई कोशिकाओं का निर्माण सीमित रहता है​-और वह है मस्तिष्क।

बढ़ती उम्र और क्षतिग्रस्त न्यूरॉन याददाश्त में कमी और बीमारियों से उबरने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। इसी वजह से लंबे समय से वैज्ञानिक यह मानते रहे हैं कि अगर मस्तिष्क में नई कोशिकाएं बनने की प्रक्रिया​,जिसे न्यूरोजेनेसिस कहा जाता है​-को बढ़ाया जाए, तो इन समस्याओं को कम किया जा सकता है

हालांकि, नए शोध ने इस धारणा को चुनौती दी है। अध्ययन के अनुसार, न्यूरोजेनेसिस हमेशा फायदेमंद नहीं होता, बल्कि यह मस्तिष्क के लिए नुकसानदायक भी साबित हो सकता है। इससे यह संभावना मजबूत होती है कि वयस्क मस्तिष्क में नई कोशिकाओं का सीमित निर्माण वास्तव में एक प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र हो सकता है।

शोध में वैज्ञानिकों ने ज़ेब्रा फिंच नामक छोटे गीत गाने वाले पक्षियों के मस्तिष्क का अध्ययन किया। इन पक्षियों में जीवनभर न्यूरोजेनेसिस होता रहता है, जो उन्हें अध्ययन के लिए आदर्श बनाता है।

इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की मदद से वैज्ञानिकों ने देखा कि नए न्यूरॉन मस्तिष्क में अपने लक्ष्य तक कैसे पहुंचते हैं। पहले यह माना जाता था कि ये कोशिकाएं मस्तिष्क की विशेष संरचनाओं​-ग्लियल स्कैफोल्ड​-के सहारे सही जगह तक पहुंचती हैं। लेकिन अध्ययन में पाया गया कि नए न्यूरॉन पुराने न्यूरल रास्तों को “भेदते” हुए सीधे आगे बढ़ते हैं।

सबसे अहम खोज यह रही कि ये नए न्यूरॉन अपेक्षाकृत अधिक कठोर होते हैं और मस्तिष्क के ऊतकों के बीच से गुजरते समय आसपास की संरचनाओं को प्रभावित करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह प्रक्रिया मस्तिष्क के मौजूदा सर्किट को बदल सकती है और उन कनेक्शनों को तोड़ सकती है, जो याददाश्त के लिए जरूरी होते हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो​- नए न्यूरॉन बनने की प्रक्रिया, पुराने न्यूरल नेटवर्क को नुकसान पहुंचा सकती है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इंसान और अन्य स्तनधारी शायद इसलिए वयस्क अवस्था में न्यूरोजेनेसिस को सीमित रखते हैं, ताकि लंबे समय तक बनी रहने वाली महत्वपूर्ण यादों को सुरक्षित रखा जा सके।

हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि पक्षियों और स्तनधारियों के मस्तिष्क की संरचना अलग-अलग होती है। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यही प्रक्रिया इंसानी मस्तिष्क में भी समान रूप से होती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस शोध से यह समझने में मदद मिलेगी कि मस्तिष्क कैसे संतुलन बनाता है​- नई कोशिकाएं बनाने और​ पुरानी यादों को सुरक्षित रखने के बीच।

यह अध्ययन भविष्य में न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के इलाज के नए रास्ते खोल सकता है, लेकिन साथ ही यह भी संकेत देता है कि हर समाधान के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े होते हैं।

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