इस संकट की मुख्य वजह भारत से बड़े पैमाने पर सस्ते और ड्यूटी-फ्री धागे (यार्न) का आयात बताया जा रहा है, जिससे बांग्लादेश की स्थानीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री बुरी तरह प्रभावित हुई है।
भारतीय यार्न की कम कीमत और बेहतर गुणवत्ता के चलते बांग्लादेशी मिलें प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रही हैं और कई इकाइयां बैंक लोन चुकाने में भी असमर्थ हो गई हैं। ऐसे हालात में सूरत के कपड़ा व्यापारियों को नए व्यापारिक अवसर नजर आ रहे हैं।
सूरत टेक्सटाइल्स एंड ट्रेड फेडरेशन एसोसिएशन के प्रमुख कैलाश हाकिम ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल और अनिश्चितता के माहौल के बीच यह स्थिति भारतीय उद्योग, खासकर सूरत के लिए एक बड़ा अवसर है।
उन्होंने कहा कि भारत गारमेंटिंग और एक्सपोर्ट के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ेगा और यह घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि भारतीय धागा उच्च गुणवत्ता वाला है। बांग्लादेश में लोकल मैन्युफैक्चरिंग सीमित थी और वहां भारतीय कपड़े पर ही गारमेंटिंग की जाती थी। अब आने वाला समय भारत का है और सरकार व उद्यमी मिलकर स्किल डेवलपमेंट पर काम कर रहे हैं, ताकि भारतीय कपड़ा एक मजबूत ब्रांड के रूप में वैश्विक बाजार में उभर सके।
हाकिम ने बताया कि गारमेंटिंग सेक्टर में सस्ती लेबर और स्किल के कारण बांग्लादेश अब तक आगे रहा है, लेकिन भारत में भी अब क्लस्टर डेवलपमेंट और विभिन्न योजनाओं पर तेजी से काम हो रहा है। देशभर में टेक्सटाइल और गारमेंट पार्क विकसित किए जा रहे हैं, जिन पर सरकार विशेष ध्यान दे रही है।
उन्होंने बताया कि देश का लगभग 65 प्रतिशत पॉलिस्टर कपड़ा सूरत में तैयार होता है और बांग्लादेश की टेक्सटाइल इंडस्ट्री को जो एडवांटेज अब तक मिला था, वह आगे चलकर सूरत के कारोबारियों को मिलने की उम्मीद है।
कपड़ा व्यापारी अक्षय राठौड़ ने इस घटनाक्रम को सूरतवासियों के लिए खुशी की लहर बताया। उन्होंने कहा कि भारत के कुल कपड़ा व्यापार का करीब 65 प्रतिशत हिस्सा सूरत से जुड़ा हुआ है और गारमेंट सेक्टर के लिए यह समय एक सुनहरा अवसर लेकर आया है।
अक्षय राठौड़ के अनुसार, बांग्लादेश सरकार की विफल नीतियों का सीधा फायदा सूरत के कपड़ा कारोबारियों को मिलने वाला है। सूरत में गारमेंटिंग को लेकर युवाओं में पहले से ही उत्साह है और कई संस्थान स्किल डेवलपमेंट पर फोकस कर रहे हैं।
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