बरसाना में होली का त्योहार सिर्फ रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि प्रेम और उत्साह का रंग है, जिसमें मीठी गालियों के साथ वृंदावन और नंदगांव के हुरियारों का स्वागत किया जाता है। वैसे तो पूरे बरसाना में ही होली का रंग उड़ता है, लेकिन बरसाना की ‘रंगीली गली’ में अलग ही आनंद वाली होली खेली जाती है। ये गली न केवल एक मार्ग है, बल्कि ब्रज की सदियों पुरानी संस्कृति और लट्ठमार होली का जीवंत केंद्र है।
मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ इसी गली से होते हुए राधा रानी और गोपियों से होली खेलने जाते थे। करीब 100 मीटर लंबी इस गली का इतिहास सदियों पुराना है और इसे प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
लट्ठमार होली के लिए पहले फाल्गुन शुक्ल नवमी के दिन यानी लड्डू होली के दिन बरसाना की सखियां नंदगांव के ग्वालों को होली खेलने का न्योता देती हैं और भेंट स्वरूप मिष्ठान भी दिए जाते हैं और राधा-कृष्ण के प्रेम को समर्पित गीत भी गाते हैं।
‘रंगीली गली’ में खेली गई होली शौर्य और प्रेम का प्रतीक मानी जाती है, क्योंकि पुरुषों को सिर्फ बचाव का अधिकार होता है और महिलाएं लाठी-डंडों से पुरुषों की पिटाई करती हैं। इसी वजह से लट्ठामार होली को महिलाओं के शक्ति और शौर्य के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।



