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बांके बिहारी मंदिर का ठेका सलीम खान को मिलते ही संतों में नाराजगी, सीएम योगी को लिखा पत्र

ठेका रद्द करने की मांग

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उत्तर प्रदेश के मथुरा में बांके बिहारी मंदिर से जुड़ा विवाद गहराता जा रहा है। मंदिर परिसर और गलियारों में स्टील रेलिंग लगाने का ठेका एक मुस्लिम ठेकेदार को दिए जाने को लेकर ब्रज क्षेत्र के संतों और श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास ने कड़ा विरोध जताया है। इस मामले में संतों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर ठेका रद्द करने की मांग की है।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश फलाहारी महाराज ने अपने पत्र में आरोप लगाया है कि यह ठेका मेरठ स्थित कनिका कंस्ट्रक्शन से जुड़े सलीम अहमद उर्फ सलीम खान को दिया गया है। कुछ रिपोर्टों में सलीम को कंपनी का मालिक बताया गया है, जबकि अन्य के अनुसार वह कंपनी का प्रमुख साझेदार है और कांग्रेस से जुड़ा नेता भी है। पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि मथुरा के अपर जिलाधिकारी (एडीएम) की भूमिका भी इस टेंडर को दिलाने में संदिग्ध रही है। उल्लेखनीय है कि सलीम खान को कोविड-19 महामारी के दौरान भी खाद्य पैकेट वितरण का ठेका दिया गया था।

दिनेश फलाहारी महाराज ने कहा कि ब्रज के निवासी इस बात को स्वीकार नहीं कर सकते कि सनातन धर्म के विरोधी  माने जाने वाले लोग उस पवित्र स्थल में प्रवेश करें, जहां राधा और कृष्ण ने महारास किया था। उन्होंने अपने बयान में कहा, “अगर गोमांस खाने वाले और हिंदुओं को काफिर मानने वाले लोग बांके बिहारी के आंगन में आएंगे, तो हमारे कन्हैया भी हमसे नाराज होंगे।”

संतों की ओर से यह भी आरोप लगाया गया है कि सलीम अहमद खान ने अपनी धार्मिक पहचान छिपाकर यह ठेका हासिल किया। फलाहारी महाराज ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग करते हुए कहा, “जब हमारे सनातनी समाज में हजारों कुशल हिंदू ठेकेदार मौजूद हैं, तो मुगलों के वंशजों को मंदिर परिसर में प्रवेश क्यों दिया जा रहा है? इन (मुस्लिम) लोगों का बांके बिहारी मंदिर से एक किलोमीटर के दायरे में प्रवेश प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।”

विरोध जता रहे संतों का कहना है कि हिंदू मंदिरों के सौंदर्यीकरण का काम उन लोगों को सौंपना, जिन्हें वे ऐतिहासिक रूप से मंदिर विध्वंस से जोड़कर देखते हैं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर सीधा प्रहार है। संतों का यह भी आरोप है कि मथुरा, काशी और अयोध्या जैसे पवित्र स्थलों पर अतीत में नमाज अदा किए जाने की घटनाओं से जुड़ी स्मृतियां आज भी समाज में मौजूद हैं, और ऐसे में इस तरह के ठेके धार्मिक भावनाओं को आहत करते हैं।

राज्य सरकार या जिला प्रशासन की ओर से अभी तक इस विवाद पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। संतों की मांग के बाद अब यह देखना होगा कि सरकार इस ठेके को लेकर क्या रुख अपनाती है और क्या किसी जांच या समीक्षा के आदेश दिए जाते हैं।

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