EU के साथ ‘मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील’ से भारत को क्या मिलेगा?

जानिए इस ऐतिहासिक समझौते के आर्थिक परिणाम कहां होंगे

EU के साथ ‘मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील’ से भारत को क्या मिलेगा?

What will India gain from the ‘mother of all trade deals’ with the EU?

भारत और यूरोपीय संघ (EU) एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की घोषणा के लिए तैयार हैं, जिसे नीति-निर्माता और वैश्विक बाजार “मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स” के रूप में देख रहे हैं। इस समझौते का उद्देश्य निर्यात को बढ़ावा देना, टैरिफ घटाना और भारत-EU के बीच वैल्यू-चेन इंटीग्रेशन को गहरा करना है। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रिक वाहन (EV), टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में इसके दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक व्यापार वातावरण अस्थिर बना हुआ है।

वर्तमान में भारत-EU के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार 136 अरब डॉलर को पार कर चुका है। हालांकि अर्थशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं का मानना है कि यह नया समझौता लागत घटाने, सप्लाई-चेन को मजबूत करने और भारत को एक वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग व निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

बता दें की, भारत और EU के बीच व्यापार वार्ताएं एक दशक से भी पहले शुरू हुई थीं, लेकिन स्थानिक बाजार तक पहुंच, टैरिफ और रेगुलेटरी मानकों को लेकर दोनों पक्षों में मतभेदों के कारण वार्ताएं करीब नौ वर्षों तक ठप रहीं। दोनों पक्षों को जब यह अहसास हुआ कि रणनीतिक आर्थिक विविधीकरण अब अनिवार्य हो गया है, तब 2022 में वार्ताओं को औपचारिक रूप से फिर से शुरू किया गया। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लेयेन के बीच बातचीत के बाद इन चर्चाओं में तेजी आई और समझौते को फास्ट-ट्रैक किया गया।

वार्ताओं के दौरान ऑटोमोबाइल सेक्टर सबसे विवादास्पद रहा। भारत फिलहाल प्रीमियम सेगमेंट की विदेशी निर्मित कारों  100 प्रतिशत से अधिक का आयात शुल्क लगाता है। हालांकि इस समझौते के तहत EU में बनी कारों पर टैरिफ घटाकर लगभग 40 प्रतिशत किए जाने की संभावना है। इसके साथ-साथ भारत यूरोपीय उत्पादों पर आयात शुल्क में कटौती करेगा, जबकि EU भारतीय मैन्युफैक्चरिंग, केमिकल्स, टेक्सटाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात को बेहतर बाजार पहुंच देगा।

समझौते के दायरे में कई संवेदनशील क्षेत्रों को सावधानी से संभाला गया है। भारत की ओर से कृषि और डेयरी उत्पादों को पूरी तरह समझौते से बाहर रखा गया है, ताकि भारत के करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका पर प्रतिकूल असर न पड़े।

भारत लंबे समय से EU द्वारा लगाए जा रहे गैर-टैरिफ अवरोधों, विशेषकर स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट पर कार्बन-संबंधित लेवी को लेकर आपत्ति जताता रहा है। इसके अलावा, EU द्वारा जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (GSP) के तहत भारतीय उत्पादों को मिलने वाली रियायतें कम किए जाने से लगभग 2 अरब डॉलर के निर्यात पर असर पड़ा है। अधिकारियों का मानना है कि नया FTA इन दबावों की भरपाई में मदद करेगा।

भारत-EU व्यापार की मौजूदा तस्वीर

वित्त वर्ष 2025 में भारत-EU वस्तु व्यापार 136 अरब डॉलर से अधिक रहा। इसमें भारत का निर्यात 75.9 अरब डॉलर और आयात 60.7 अरब डॉलर रहा। EU को भारत का सबसे बड़ा निर्यात रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का रहा, जिसकी कीमत 15 अरब डॉलर रही। इलेक्ट्रॉनिक्स 11.3 अरब डॉलर के साथ दूसरा सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र बना, जिसमें अकेले स्मार्टफोन का योगदान 4.3 अरब डॉलर रहा है। टेक्सटाइल और परिधान निर्यात भी मजबूत रहा, जबकि ऑर्गेनिक केमिकल्स, मशीनरी, आयरन-स्टील और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्र अहम बने रहे।

यूरोपीय संघ भारत में एक प्रमुख निवेशक भी है। अप्रैल 2000 से सितंबर 2024 के बीच यूरोपीय संघ से कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 117.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर रहा। भारत में लगभग 6,000 यूरोपीय संघ की कंपनियां कार्यरत हैं, जिनमें से अधिकांश नीदरलैंड, जर्मनी और फ्रांस से हैं।

भारत के EU से आयात मुख्यतः पूंजी-गहन और टेक्नोलॉजी-ड्रिवन क्षेत्रों में केंद्रित हैं। भारत की EU देशों से FY2025 में हाई-एंड मशीनरी की आयात 13 अरब डॉलर रही है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरक्राफ्ट, मेडिकल डिवाइसेज़ और विशेष दवाइयों का आयात भी बड़ी संख्या में होती रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये आयात भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और MSME सेक्टर के लिए आवश्यक इनपुट उपलब्ध कराते हैं।

भारत और यूरोपीय संघ को होने वाले लाभ:

भारत-EU के बीच FTA के बाद के जिन प्रमुख क्षेत्रों को लाभ मिलने की संभावना है उनमें कपड़ा, परिधान, चमड़ा, फार्मास्यूटिकल्स, इस्पात, पेट्रोलियम उत्पाद, विद्युत मशीनरी और ऑटो कंपोनेंट्स शामिल हैं। कम शुल्क से विशेष रूप से श्रम-प्रधान क्षेत्रों को मदद मिल सकती है। मौजूदा हालात में भारत को बांग्लादेश और वियतनाम जैसे प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में उच्च शुल्क का सामना करना पड़ता है। समझौते में संतुलन स्थापित होने के साथ-साथ भारत के सेवा निर्यात, जैसे कि आईटी, दूरसंचार, व्यावसायिक सेवाएं और परिवहन, में भी वृद्धि होने की उम्मीद है।

यूरोपीय संघ को भारत को विमान और उसके पुर्जों, विद्युत मशीनरी, रसायन और हीरे के निर्यात में वृद्धि से लाभ होने की उम्मीद है। बौद्धिक संपदा, आईटी और पेशेवर सेवाओं जैसे यूरोपीय सेवा क्षेत्रों में भी अवसरों में वृद्धि हो सकती है।

इसी बीच ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) का कहना है कि यह दोनों पक्षों के बीच होने जा रहा FTA घरेलू उद्योग को नुकसान नहीं पहुंचाएगा, बल्कि इनपुट लागत घटाकर प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा। भारत और EU वैल्यू-चेन के अलग-अलग हिस्सों में काम करते हैं, भारत श्रम-प्रधान उत्पादन में मजबूत है, जबकि EU पूंजीगत वस्तुएं और उन्नत तकनीक उपलब्ध कराता है।

हालांकि दोनों पक्षों की बातचीत पूरी हो चुकी है, लेकिन समझौता तुरंत लागू नहीं होगा। अगले पांच-छह महीनों में कानूनी जांच, फिर औपचारिक हस्ताक्षर और यूरोपीय संसद की मंजूरी जरूरी होगी। अधिकारियों को उम्मीद है कि यह समझौता लगभग एक वर्ष में प्रभावी हो सकता है। कुल मिलाकर, भारत-EU मुक्त व्यापार समझौता हाल के वर्षों में भारत द्वारा किया गया सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक संरेखण बनकर उभरेगा।

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