अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को गहरे संकट में डाल दिया है। ईरान लगातार खाड़ी देशों के तेल उत्पादन केन्द्रो पर हमलें कर चूका है, दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है और कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल रहा है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से तेल बचाने की अपील करते हुए मौजूदा हालात को कोरोना महामारी के बाद इस दशक का सबसे बड़ा संकट बताया है।
प्रधानमंत्री की यह अपील ऐसे समय आई है जब दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने चेतावनी दी है कि वैश्विक कच्चे तेल का स्टॉक तेजी से खतरनाक निचले स्तर की ओर बढ़ रहा है। पश्चिम एशिया में तनाव कम होने के कोई संकेत फिलहाल दिखाई नहीं दे रहे, जिससे आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है। रॉयटर्स के एक सर्वे के मुताबिक अप्रैल महीने में OPEC देशों का दैनिक तेल उत्पादन 8.3 लाख बैरल घटकर औसतन 20.04 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया। यह साल 2000 के बाद का सबसे निचला स्तर है।
रिपोर्ट के अनुसार, ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से एक अरब बैरल से अधिक कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है। इसका सबसे बड़ा असर होर्मुज स्ट्रेट पर पड़ा है, जहां से दुनिया की करीब 20 फीसदी तेल सप्लाई गुजरती है। कुवैत का तेल निर्यात अप्रैल में लगभग शून्य हो गया क्योंकि उसका पूरा निर्यात होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर है। वहीं सऊदी अरब और इराक के तेल उत्पादन में भी भारी गिरावट दर्ज की गई।
सऊदी अरब के ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों के बाद उसका उत्पादन घटकर करीब 7 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया। हालांकि सऊदी अरब फिलहाल ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए लाल सागर के रास्ते कच्चे तेल का निर्यात जारी रखे हुए है।
दूसरी ओर संयुक्त अरब अमीरात ने उत्पादन बढ़ाया है क्योंकि वह होर्मुज स्ट्रेट को बायपास कर गल्फ ऑफ ओमान स्थित फुजैरा पोर्ट से तेल निर्यात कर रहा है। यूएई फिलहाल 3.2 से 3.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल उत्पादन कर रहा है और अगले साल तक इसे 5 मिलियन बैरल तक पहुंचाने की तैयारी में है।
वेनेज़ुएला और लीबिया ने अप्रैल में तेल उत्पादन बढ़ाया, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इससे होर्मुज स्ट्रेट से बाधित सप्लाई की भरपाई संभव नहीं है। वेनेजुएला का निर्यात बढ़कर 1.23 मिलियन बैरल प्रतिदिन पहुंच गया, जो 2018 के बाद सबसे ज्यादा है। वहीं लीबिया का उत्पादन 1.43 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो पिछले 10 वर्षों का उच्चतम स्तर माना जा रहा है।
वैश्विक संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त तेजी आई है। हाल ही में ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है, जो 2022 के बाद सबसे ऊँचे स्तर पर है। फिलहाल ब्रेंट क्रूड करीब 105 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है।
तेल महंगा होने से दुनिया के कई देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ चुकी हैं। हालांकि भारत में फिलहाल ईंधन कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। भारत अपनी लगभग 80 फीसदी तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए वैश्विक तेल संकट का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ सकता है।
बढ़ती तेल कीमतों और विदेशी मुद्रा पर दबाव के बीच केंद्र सरकार ईंधन खपत कम करने की रणनीति पर काम कर रही है। इसी के तहत प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से सार्वजनिक परिवहन, कारपूलिंग और डिजिटल माध्यमों के अधिक इस्तेमाल की अपील की है। अगर पश्चिम एशिया में जल्द शांति बहाल नहीं हुई तो आने वाले महीनों में वैश्विक ऊर्जा संकट और गहरा सकता है, जिसका असर भारत समेत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ना तय है।
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