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क्या है गंडूष क्रिया, आयुर्वेद में मुख स्वास्थ्य के लिए तेल से क्यों करनी है कुल्ला

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आज के दौर में बदबूदार सांसे, दांतो में सडन, झनझनाहट की समस्याओं से हर कोई परेशान है, इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए लोग तरह तरह के केमिकल माउथवॉश का इस्तेमाल करते है, फिर भी यह लंबे समय नहीं टिकता और जेबों में माउथफ्रेशनर लेकर घूमना पड़ता है। लेकीन क्या आपको पता है की दांतों की सड़न, मसूड़ों की कमजोरी, बदबूदार सांस और बार-बार होने वाले मुख संक्रमण जैसी समस्याओं को केवल सामान्य ब्रशिंग और बाजार में मिलने वाले केमिकल मिश्रीत माउथफ्रेशनर से पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता। ऐसे में आयुर्वेद में वर्णित गंडूष क्रिया को एक प्रभावी पारंपरिक विधि के रूप में बताया गया है, जिसे आज के दौर में ऑयल पुलिंग कहा जाता है। आयुर्वेद में मुख स्वास्थ्य को संपूर्ण शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ माना गया है।

गंडूष क्रिया का उल्लेख सुश्रुत और वाग्भट जैसे प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों के ग्रंथों में मिलता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें वनस्पति तेल या औषधीय द्रव को मुख में भरकर कुछ समय तक रखा या घुमाया जाता है, जिससे मुख में मौजूद विषाक्त तत्व बाहर निकलते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, जब तेल को मुंह में रखा जाता है तो वह दांतों, मसूड़ों और जीभ से विषाक्त पदार्थों को अपने भीतर खींच लेता है, जिन्हें बाद में थूक दिया जाता है।

आयुर्वेद में तेल कुल्ला की दो विधियां बताई गई हैं, गंडूष और कवला। गंडूष में अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में तेल मुख में भरा जाता है, जिसे अधिक देर तक नहीं रखा जाता और उसमें अधिक हलचल नहीं की जाती। वहीं कवला में कम मात्रा में तेल लिया जाता है और उसे 15 से 20 मिनट तक मुख में घुमाया या गरारा किया जाता है। कवला आमतौर पर घर पर किया जा सकता है, जबकि गंडूष के कुछ प्रकार आयुर्वेदिक केंद्रों में विशेषज्ञ निगरानी में किए जाते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार, नियमित रूप से गंडूष करने से मुख स्वच्छता बेहतर होती है। यह दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने, प्लाक हटाने और बैक्टीरिया को नियंत्रित करने में कारगर होता है। तेल में मौजूद प्राकृतिक जीवाणुरोधी गुण मुख में संक्रमण फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों को कम करने में मदद करते हैं। इसके अलावा, गंडूष क्रिया से सांस की दुर्गंध कम होने, मुख को ताजगी मिलने और मसूड़ों से जुड़ी समस्याओं में राहत मिलती है।

कुछ आयुर्वेदाचार्य यह भी मानते हैं कि नियमित गंडूष से चेहरे की मांसपेशियां मजबूत होती हैं और दांतों की प्राकृतिक चमक बनी रहती है। साथ ही, मुख में विषाक्त तत्वों की कमी से पाचन पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

गंडूष क्रिया प्रायः सुबह खाली पेट की जाती है। इसके लिए तिल, सरसों, नारियल या सूरजमुखी के तेल का उपयोग किया जाता है। एक से दो चम्मच तेल मुख में लेकर दांतों, मसूड़ों और जीभ के आसपास हल्के से घुमाया जाता है। १५ – २० मिनट बाद तेल को पूरी तरह थूक देना आवश्यक होता है। इसके बाद गुनगुने पानी से कुल्ला कर सामान्य ब्रशिंग की जाती है।

आयुर्वेद में गंडूष के विभिन्न प्रकार बताए गए हैं, जैसे स्नेहन (पोषण देने वाला), शमन (दोष संतुलन), शोधन (शुद्धिकरण) और रोपण (घाव भरने में सहायक)। इनका चयन व्यक्ति की समस्या और प्रकृति के अनुसार किया जाता है। कुल मिलाकर, गंडूष क्रिया आयुर्वेद में मुख स्वास्थ्य बनाए रखने की एक समय-परीक्षित पद्धति मानी जाती है, जिसे आज भी बड़ी संख्या में लोग दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बना रहे हैं।

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