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Tuesday, October 27, 2026
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बाइपोलर डिसऑर्डर: उन्माद और अवसाद के बीच फंसा जीवन, डब्ल्यूएचओ से जानें समाधान

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हॉलीवुड एक्टर रॉबर्ट कैराडाइन ने 71 वर्ष की आयु में आत्महत्या कर ली। उनके परिवार ने पुष्टि की कि वह लंबे समय से बाइपोलर डिसऑर्डर जैसी गंभीर मानसिक समस्या से जूझ रहे थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, बाइपोलर डिसऑर्डर एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जो व्यक्ति के मूड, एनर्जी, एक्टविटी और सोच को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।

इस बीमारी में व्यक्ति का मूड चरम पर बदलता रहता है। वह कभी उन्माद (मैनिया या हाइपोमेनिया) और कभी गहरी उदासी या अवसाद में चला जाता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 37 मिलियन लोग (वैश्विक आबादी का 0.5 प्रतिशत) बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित हैं। यह बीमारी मुख्य रूप से कामकाजी उम्र के लोगों में दिखती है, लेकिन युवाओं में भी हो सकती है। पुरुषों और महिलाओं में इसकी व्यापकता लगभग बराबर है।

बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित लोगों को गलत निदान, अपर्याप्त इलाज और समाज में कलंक का सामना करना पड़ता है। कई लोगों को उचित उपचार नहीं मिल पाता, जिस वजह से यह स्थिति और खतरनाक हो जाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन बताता है कि बाइपोलर डिसऑर्डर में दो मुख्य चरण होते हैं। इनमें पहला उन्माद या हाइपोमेनिया है, जिसमें व्यक्ति बहुत अधिक एनर्जी से भरा, खुश, उत्साहित या चिड़चिड़ा हो जाता है। इस स्थिति में वह तेजी से बोलता है, कम नींद लेता है, रिस्क भरे काम करता है। उसे कभी-कभी भ्रम भी हो सकता है।

वहीं, दूसरी स्थिति अवसाद की होती है। इस दौरान उदासी, रुचि की कमी, थकान, नींद या भूख न लगना या ज्यादा लगना, अपराधबोध महसूस करना, निराशा और आत्महत्या के विचार तक आ सकते हैं। ये लक्षण लंबे समय तक रह सकते हैं।

बाइपोलर जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करता है – रिश्ते बिगड़ते हैं, शिक्षा और काम प्रभावित होते हैं। इससे आत्महत्या का खतरा बहुत बढ़ जाता है। बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित लोग धूम्रपान, शराब या नशे की लत में ज्यादा पड़ते हैं, शारीरिक बीमारियां भी ज्यादा होती हैं।

स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि सही देखभाल से बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित लोग सार्थक जीवन जी सकते हैं। समाज में कलंक कम करना और समय पर इलाज उपलब्ध कराना जरूरी है। बाइपोलर डिसऑर्डर का इलाज पूरी तरह संभव है।

दवाएं:- मूड स्टेबलाइजर (जैसे लिथियम, वैल्प्रोएट) और एंटीसाइकोटिक्स से उन्माद और अवसाद को नियंत्रित किया जा सकता है। दवाओं से पुनरावृत्ति रोकने में मदद मिलती है।

मनोचिकित्सा:- संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा, पारिवारिक थेरेपी से लक्षण कम होते हैं और रिकवरी तेज होती है।

जीवनशैली:- नियमित नींद, व्यायाम, स्वस्थ आहार और तनाव प्रबंधन बहुत जरूरी हैं।

सहायता:- परिवार, दोस्त और सहायता समूह का साथ महत्वपूर्ण है।

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