भारत में सामान्य रूप से बगीचों, मैदानों और सड़क किनारे उगने वाला एक छोटा सा पौधा — चांगेरी, जिसे आमतौर पर खट्टी घास के नाम से जाना जाता है, न केवल चटनी और सूप का स्वाद बढ़ाता है, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है। इसका वैज्ञानिक नाम Oxalis corniculata है और यह बारहमासी पौधा अपने खट्टे स्वाद के लिए जाना जाता है।
प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों — चरक संहिता और सुश्रुत संहिता — में चांगेरी का उल्लेख शाक वर्ग के तहत किया गया है। इसे खास तौर पर अतिसार (दस्त), पाचन तंत्र की गड़बड़ी और बवासीर जैसे रोगों में उपयोगी माना गया है। इसके पत्तों का काढ़ा (20-40 मि.ली.) भुनी हुई हींग के साथ लेने से पेट दर्द और पाचन समस्याओं में राहत मिलती है। यह महिलाओं में पाचन तंत्र को भी मजबूत बनाता है।
चांगेरी के पत्तों का रस मिश्री के साथ लेने से ल्यूकोरिया (व्हाइट डिस्चार्ज) जैसी समस्याओं में राहत मिलती है। यह हड्डियों की कमजोरी और पीठ दर्द जैसी समस्याओं में भी कारगर मानी जाती है। इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीफंगल गुण चेहरे पर मुंहासे, काले धब्बे और जलन को कम करने में सहायक हैं। चांगेरी के फूलों को चावल के आटे में मिलाकर चेहरे पर लगाने से रंग में निखार आता है और दाग-धब्बों से छुटकारा मिलता है।
चांगेरी विटामिन-सी का अच्छा स्रोत है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है और स्कर्वी जैसी बीमारियों से बचाव करता है। इसके पत्तों का लेप जोड़ों के दर्द, सूजन और गठिया में राहत देता है। इसके सूजन-रोधी गुण शरीर की सूजन कम करने में मदद करते हैं।
हालांकि चांगेरी का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है, लेकिन किसी भी बीमारी या पुरानी समस्या में इसके उपयोग से पहले चिकित्सक की सलाह अवश्य लेनी चाहिए। स्वाद और सेहत का ऐसा मेल चांगेरी को एक अनोखा प्राकृतिक उपहार बनाता है।
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