सफेदभाटी, जिसे बियरबेरी के नाम से भी जाना जाता है, एक झाड़ीनुमा पौधा है जो खासतौर पर उत्तरी गोलार्ध के ठंडे इलाकों में पाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Arctostaphylos uva-ursi है। यह पौधा सालभर हरा-भरा रहता है और वसंत ऋतु में इस पर सफेद या हल्के गुलाबी रंग के छोटे-छोटे घंटीनुमा फूल खिलते हैं। इसके बाद इसमें चमकदार लाल या नारंगी रंग के छोटे गोल फल लगते हैं, जो भालुओं को अत्यंत प्रिय होते हैं — यही कारण है कि इसे ‘बियरबेरी’ कहा जाता है।
सफेदभाटी न केवल आकर्षक सजावटी पौधा है, बल्कि इसके औषधीय गुण भी कमाल के हैं। इसकी पत्तियों में अर्बुटिन नामक सक्रिय घटक पाया जाता है, जो शरीर में जाकर हाइड्रोक्विनोन में परिवर्तित हो जाता है। यह यौगिक मूत्रनली संक्रमण (UTI) से लड़ने, मूत्राशय की सूजन कम करने और गुर्दे की पथरी को रोकने या बाहर निकालने में मदद करता है। साथ ही, यह मूत्र प्रवाह बढ़ाने और मूत्र के पीएच को संतुलित करने में भी कारगर होता है।
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, सफेदभाटी में मौजूद सूजन-रोधी (anti-inflammatory) तत्व जोड़ों के दर्द और अन्य सूजन संबंधी रोगों में भी राहत पहुंचाते हैं। यही वजह है कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसे गुर्दे की पथरी और गठिया जैसी समस्याओं के लिए वर्षों से इस्तेमाल किया जाता रहा है।
हालांकि, इसके इस्तेमाल को लेकर सावधानी भी जरूरी है। बिना चिकित्सकीय सलाह के इसका सेवन नहीं करना चाहिए, विशेषकर यदि किसी को गुर्दे से संबंधित गंभीर समस्याएं हों। साथ ही, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को इसके उपयोग से बचना चाहिए। कुछ अमेरिकी आदिवासी समुदाय इसकी सूखी पत्तियों को तंबाकू के विकल्प के रूप में ‘किनिकिनिक’ नामक मिश्रण में इस्तेमाल करते थे।
प्राकृतिक चिकित्सा में रुचि रखने वालों के लिए सफेदभाटी एक प्रभावशाली पौधा है, परंतु इसके औषधीय प्रयोग से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।
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