राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को राहत; बोरियों के उपयोग शुल्क में 40 प्रतिशत की वृद्धि !

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को राहत; बोरियों के उपयोग शुल्क में 40 प्रतिशत की वृद्धि !

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नई दिल्ली, 30 अगस्त। केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बड़ी राहत देते हुए बोरियों के उपयोग शुल्क में करीब 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी का ऐलान किया है। अब प्रत्येक प्रयुक्त बोरी पर शुल्क 7.32 रुपए से बढ़ाकर 10.22 रुपए कर दिया गया है, या फिर राज्य सरकार/केंद्र शासित प्रदेश द्वारा वहन की गई वास्तविक लागत — जो भी कम हो, उसी दर से शुल्क लिया जाएगा। यह संशोधित दरें खाद्यान्न खरीद वर्ष 2025-26 (KMS 2025-26) से लागू होंगी।

केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि इस निर्णय का उद्देश्य खाद्यान्न की सुचारू खरीद और वितरण व्यवस्था को मजबूत करना है। उन्होंने बताया कि इससे सस्टेनेबल पैकेजिंग प्रथाओं को बढ़ावा मिलेगा और केंद्र व राज्यों के बीच सहयोग भी बेहतर होगा।

दरअसल, KMS 2017-18 से लेकर 2024-25 तक नए बोरियों की लागत लगातार बढ़ती रही है। इसी अनुपात में प्रयुक्त बोरियों के उपयोग शुल्क में संशोधन किया गया है। सरकार को इस संबंध में विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से लंबे समय से मांगें मिल रही थीं। इसके बाद खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने एक समिति का गठन किया, जिसमें राज्यों और एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) के प्रतिनिधि शामिल थे। आंध्र प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और हरियाणा ने अपने सुझाव भी इस समिति को सौंपे।

गौरतलब है कि इस सप्ताह की शुरुआत में ही सरकार ने गेहूं की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए बड़ा कदम उठाया था। सरकार ने थोक और खुदरा व्यापारियों तथा प्रोसेसर्स पर लागू गेहूं की स्टॉक सीमा को घटाकर 31 मार्च 2026 तक लागू करने का निर्णय लिया है। अब थोक विक्रेताओं के लिए स्टॉक सीमा 3,000 मीट्रिक टन से घटाकर 2,000 मीट्रिक टन कर दी गई है, जबकि खुदरा विक्रेताओं के लिए यह सीमा 10 मीट्रिक टन से घटाकर 8 मीट्रिक टन तय की गई है। इसी तरह, गेहूं प्रोसेसर्स के लिए भंडारण सीमा मासिक स्थापित क्षमता (MIC) के 70 प्रतिशत से घटाकर 60 प्रतिशत कर दी गई है।

सरकार का कहना है कि ये फैसले जमाखोरी और सट्टेबाजी पर रोक लगाने के लिए जरूरी हैं, ताकि कृत्रिम कमी पैदा कर कीमतों को बढ़ाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सके। इन कदमों से त्योहारों से पहले खाद्यान्न की उपलब्धता और आम उपभोक्ताओं के लिए दाम स्थिर रखने में मदद मिलेगी।

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