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Monday, April 13, 2026
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लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित की ब्रिगेडियर पदोन्नति का रास्ता साफ

AFT ने रिटायरमेंट पर लगाई रोक, सेना ने प्रमोशन को दी मंजूरी; लंबी सुनवाई से करियर प्रभावित होने का दावा

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भारतीय सेना ने लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित को ब्रिगेडियर पद पर पदोन्नति देने के लिए मंजूरी दे दी है। सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) ने उनके रिटायरमेंट पर रोक लगा दी है और केंद्र सरकार को उनकी याचिका पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। पुरोहित 31 मार्च 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले थे, लेकिन AFT ने उनके रिटायरमेंट को फिलहाल रोकते हुए रक्षा मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। साथ ही कहा गया है कि उनकी वैधानिक शिकायत पर अंतिम निर्णय होने तक रिटायरमेंट लागू नहीं किया जाएगा।

लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित ने AFT में याचिका दायर कर कहा था कि 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण उनके सैन्य करियर पर गंभीर असर पड़ा। उनका कहना था कि इस केस की वजह से उन्हें समय पर पदोन्नति का अवसर नहीं मिल सका, जिससे उनकी सेवा प्रगति बाधित हुई।

31 जुलाई को मुंबई की NIA अदालत ने पुरोहित समेत सभी आरोपियों को मालेगांव ब्लास्ट मामले में बरी कर दिया था। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा और कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। यह मामला करीब 17 साल तक चला, जिसमें सैकड़ों गवाहों से पूछताछ और लंबी जांच प्रक्रिया शामिल रही।

इस मामले में कुल 11 लोगों को आरोपी बनाया गया था, लेकिन अंततः 7 के खिलाफ आरोप तय हुए। पुरोहित के साथ जिन अन्य आरोपियों को बरी किया गया, उनमें पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा, मेजर (सेवानिवृत्त) रमेश उपाध्याय, सुधाकर चतुर्वेदी, अजय रहिरकर, सुधाकर धर द्विवेदी (शंकराचार्य) और समीर कुलकर्णी शामिल हैं।

29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर के भिक्कू चौक इलाके में एक मोटरसाइकिल से बंधा विस्फोटक मस्जिद के पास फट गया था। इस हमले में 6 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 95 लोग घायल हुए थे। शुरुआत में इस मामले की जांच महाराष्ट्र ATS ने की थी, लेकिन 2011 में इसे राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दिया गया।

सभी आरोपियों को गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), आर्म्स एक्ट और अन्य सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। AFT के आदेश के बाद अब रक्षा मंत्रालय को पुरोहित की शिकायत पर अंतिम निर्णय लेना होगा। सेना द्वारा प्रमोशन को मंजूरी मिलने के बाद उनके ब्रिगेडियर बनने का रास्ता लगभग साफ माना जा रहा है।

यह मामला न केवल एक सैन्य अधिकारी के करियर से जुड़ा है, बल्कि यह भी दिखाता है कि लंबी न्यायिक प्रक्रिया का असर पेशेवर जीवन पर किस तरह पड़ सकता है।

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