DRDO का स्वदेशी एअर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम अंतिम चरण में

भारतीय नौसेना की पनडुब्बियों की क्षमता होगी कई गुना मजबूत

DRDO का स्वदेशी एअर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम अंतिम चरण में

DRDO's indigenous air-independent propulsion system in final stages

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम को लेकर बड़ी प्रगति का दावा किया है। DRDO प्रमुख समीर कामत ने जानकारी दी है कि पनडुब्बियों के लिए विकसित यह अत्याधुनिक प्रणाली अब लगभग तैयार है और जल्द ही इसे भारतीय नौसेना में शामिल किया जा सकता है।

आईआईटी-मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कामत ने बताया कि AIP सिस्टम का लैंड-बेस्ड प्रोटोटाइप 2021 में सफलतापूर्वक परीक्षण कर चुका है। फिलहाल इसका पूर्ण संस्करण गुजरात के हजीरा स्थित लार्सन एंड टुब्रो (L&T) प्लांट में अंतिम चरण में तैयार किया जा रहा है। इसके पूरा होते ही इसे मुंबई स्थित मझगांव डॉक में भेजा जाएगा, जहां इसे नौसेना के बेड़े की 14वीं पनडुब्बी में स्थापित किया जाएगा।

इस अत्याधुनिक तकनीक के विकास में डीआरडीओ की नेवल मैटेरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी ने प्रमुख भूमिका निभाई है। AIP सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की पानी के भीतर रहने की क्षमता को कई गुना बढ़ा देता है। इससे पनडुब्बियों को बार-बार सतह पर आने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे उनकी गोपनीयता और मारक क्षमता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।

समीर कामत ने यह भी बताया कि डीआरडीओ कई अन्य उन्नत रक्षा परियोजनाओं पर भी काम कर रहा है। इनमें एक ऐसी प्रणाली शामिल है जिसमें मिसाइल के जरिए टॉरपीडो को 400 किलोमीटर तक मार करने की क्षमता दी जा रही है, जिससे दुश्मन की पनडुब्बियों को लंबी दूरी से निशाना बनाया जा सकेगा। इसके अलावा, हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल और लेजर-निर्देशित ऊर्जा हथियारों का विकास भी जारी है, जो भविष्य के युद्ध में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

भारत के इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का जिक्र करते हुए कामत ने कहा कि अग्नि और पृथ्वी मिसाइल प्रणालियों ने देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि इन रणनीतिक हथियारों की वजह से भारत पर बड़े हमलों का खतरा काफी हद तक कम हुआ है।

कामत ने आकाश सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली और डीआरडीओ द्वारा विकसित एयरबोर्न अर्ली वार्निंग सिस्टम की भी सराहना की। उन्होंने बताया कि पिछले साल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में इन स्वदेशी प्रणालियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे उनकी प्रभावशीलता वास्तविक परिस्थितियों में साबित हुई।

AIP सिस्टम का लगभग पूरा होना भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अहम मील का पत्थर माना जा रहा है। इसके शामिल होने के बाद भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में आ जाएगा, जिनके पास यह उन्नत तकनीक स्वदेशी रूप से उपलब्ध है। इससे भारतीय नौसेना की समुद्री क्षमता और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी रणनीतिक स्थिति और मजबूत होगी।

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