भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने आधुनिक युद्धक्षेत्र में अंतरिक्ष के बढ़ते महत्व को लेकर एक गंभीर चेतावनी जारी की है। ‘इंडिया डेफस्पेस सिम्पोजियम 2026’ (India DefSpace Symposium 2026) को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत अंतरिक्ष क्षमताओं के विकास में केवल प्रतिक्रियात्मक रवैया नहीं अपना सकता। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष अब युद्ध का एक निर्णायक क्षेत्र बन चुका है जो भूमि, जल और वायु की सैन्य शक्ति को कई गुना बढ़ा देता है।
जनरल चौहान ने अंतरिक्ष को युद्ध का एक ‘गैर-परमाणु रणनीतिक क्षेत्र’ (non-nuclear strategic domain) बताया, जो पारंपरिक और परमाणु प्रतिरोध के बीच एक सेतु का काम करता है। उन्होंने अंतरिक्ष में देश की निर्भरता और सुरक्षा को लेकर एक कड़ा संदेश दिया, “अंतरिक्ष में विफलता भारत को ‘अंधे होकर’ (fight blind) लड़ने के लिए मजबूर कर देगी, जबकि इस क्षेत्र में सफलता हमें ‘दूरदर्शिता’ (fight with foresight) के साथ युद्ध लड़ने की अनुमति देगी।”
उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष केवल कुछ देशों तक सीमित नहीं रह गया है। पश्चिम एशिया के संघर्षों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि अब निजी कंपनियां और नॉन स्टेट एक्टर्स भी अंतरिक्ष क्षमताओं तक पहुंच रखते हैं। उनके अनुसार, अंतरिक्ष में कमजोरी का सीधा मतलब जमीन, समुद्र और आसमान में कमजोरी है।
सीडीएस ने पारंपरिक ‘सिचुएशन अवेयरनेस’ (परिस्थितिजन्य जागरूकता) से आगे बढ़कर ‘एंटीसिपेटरी अवेयरनेस’ (पूर्वानुमानित जागरूकता) पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही। उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अंतरिक्ष डेटा का मेल युद्ध के मैदान की चार-आयामी तस्वीर (अक्षांश, देशांतर, ऊंचाई और समय) पेश कर सकता है।निर्णय लेने की प्रक्रिया (OODA Loop – Observe, Orient, Decide, Act) पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा,“सिचुएशन अवेयरनेस से एंटीसिपेटरी अवेयरनेस की ओर यह बदलाव ओओडीए लूप को संकुचित करता है और पूर्व-खाली प्रतिक्रियाओं (pre-emptive responses) को सक्षम बनाता है। इसलिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को हमारे अंतरिक्ष ढांचे के केंद्र में होना चाहिए, परिधि पर नहीं।”
जनरल चौहान ने पिछले साल के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का उल्लेख किया, जो भारत के लिए युद्ध में अंतरिक्ष क्षमताओं के उपयोग का पहला बड़ा अनुभव था। उस दौरान चीन ने पाकिस्तान को रियल-टाइम ट्रैकिंग जानकारी दी थी, जबकि भारत ने भी योजना और क्रियान्वयन के लिए सार्वजनिक और निजी दोनों अंतरिक्ष संपत्तियों का उपयोग किया था।
सम्मेलन के दौरान ‘नाविक’ (NavIC) नेविगेशन प्रणाली की सीमाओं पर भी चर्चा हुई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सरकारी प्रयास अकेले सैन्य आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकते। जनरल चौहान ने निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स से इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने का आह्वान किया।
सीडीएस ने ‘डुअल-यूज़’ (दोहरे उपयोग) प्रणालियों के विकास पर जोर दिया, जो शांति काल में नागरिक कार्यों और संकट के समय सैन्य भूमिका में तुरंत परिवर्तित हो सकें। उन्होंने पश्चिम एशिया के उदाहरण का हवाला दिया जहां अमेरिकी सरकार के आदेश पर ‘प्लैनेट लैब्स’ जैसी निजी कंपनियों ने उपग्रह इमेजरी देना बंद कर दिया।
उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि भारत को ऐसी आत्मनिर्भर तकनीक की आवश्यकता है जो हिंद महासागर क्षेत्र में निरंतर निगरानी रख सके और विदेशी सरकारों के प्रभाव से मुक्त रहकर भारत को सामरिक बढ़त दिला सके।
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