भारत के स्वदेशी टर्बोफैन-इंजन निर्माण को लेकर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के प्रमुख समीर वी. कामत ने महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया मूल रूप से लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) के लिए विकसित किया गया कावेरी इंजन अब मानवरहित लड़ाकू हवाई वाहनों (UCAVs) के लिए अनुकूलित किया जाएगा। यह निर्णय इंजन की थ्रस्ट क्षमता और तेजस की परिचालन आवश्यकताओं के बीच बने अंतर को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
कावेरी इंजन को वर्ष 2008 में आधिकारिक रूप से तेजस कार्यक्रम से अलग कर दिया गया था, क्योंकि यह आवश्यक थ्रस्ट तक पाने में असफल रहा था। DRDO प्रमुख के अनुसार, कावेरी इंजन वर्तमान में लगभग 72 किलो न्यूटन (kN) थ्रस्ट प्रदान करता है, जबकि तेजस को प्रभावी प्रदर्शन के लिए 83 से 85 केएन थ्रस्ट की आवश्यकता होती है। इस कमी के चलते इसे मानव चालित लड़ाकू विमानों के लिए उपयुक्त नहीं माना गया।
हालांकि, DRDO इस स्थिति को असफलता के रूप में नहीं रहा है। समीर वी. कामत ने बताया कि कावेरी इंजन आफ्टरबर्नर रहित संशोधित संस्करण को लाकर भारत के आगामी UCAVs प्लेटफॉर्म्स में इस्तेमाल किया जाएगा। ऐसे मानवरहित प्लेटफॉर्म्स के लिए अत्यधिक आफ्टरबर्निंग थ्रस्ट की आवश्यकता नहीं होती और कावेरी की ‘ड्राई थ्रस्ट’ क्षमता उनके लिए उपयुक्त माना जा रहा है।
DRDO प्रमुख ने यह भी रेखांकित किया कि जेट इंजन विकास एक लंबी और जटिल प्रक्रिया होती है। वैश्विक स्तर पर भी किसी नए इंजन को परिपक्व होकर किसी प्लेटफॉर्म में एकीकृत होने में 10 से 13 वर्ष तक का समय लगता है। उन्होंने कहा कि कावेरी के साथ भारत का अनुभव इसी वैश्विक वास्तविकता के अनुरूप है।
भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए कामत ने कहा कि यदि इस वर्ष कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) से नई परियोजना को मंजूरी मिल जाती है, तो अगली पीढ़ी का स्वदेशी इंजन 2035–36 तक एकीकरण के लिए तैयार हो सकता है। इससे पहले विकास और परीक्षण चरण पूरे किए जाएंगे।
इस बीच, भारत का पांचवीं पीढ़ी का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) विदेशी इंजनों पर निर्भर रहेगा। पहले दो स्क्वाड्रन जनरल इलेक्ट्रिक के F414 इंजनों के साथ तैनात किए जाने की योजना है, ताकि परिचालन समय-सीमा में कोई देरी न हो।
कावेरी कार्यक्रम का यह नया रुख भारत की रक्षा अनुसंधान रणनीति में लचीलापन दर्शाता है। यूसीएवी जैसे प्लेटफॉर्म्स पर इंजन के उपयोग से न केवल तकनीकी अनुभव मिलेगा, बल्कि भविष्य में मानव चालित विमानों के लिए स्वदेशी इंजन विकसित करने की दिशा में भी यह एक अहम कदम माना जा रहा है। DRDO का कहना है कि एयरो-इंजन और मानवरहित प्रणालियां आने वाले वर्षों में भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता के प्रमुख स्तंभ बने रहेंगे।
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