2008 के मालेगांव बम धमाके केस में सभी सात आरोपियों को बरी करते हुए एनआईए की विशेष अदालत ने महाराष्ट्र एटीएस (ATS) की जांच को कठघरे में खड़ा कर दिया है। कोर्ट ने झूठे कबूलनामों, फर्जी लिंक, और बुनियादी फॉरेंसिक प्रक्रियाओं की अनदेखी को फैसले का मुख्य आधार बताया।
विशेष न्यायाधीश जे.के. लाहोटी ने 1500 पन्नों में अपने फैसले में कहा,”पूरा मामला त्रुटिपूर्ण, दोषपूर्ण और कानूनी प्रक्रियाओं के विरुद्ध है। कोई ठोस सबूत नहीं है, सिर्फ कल्पनाओं और अनुमानों पर आधारित है। ऐसे में दोषियों को सजा नहीं दी जा सकती।”
कोर्ट ने अपने फैसले में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कई अहम खामियों को चिन्हित किया। सबसे बड़ी लापरवाही यह रही कि ब्लास्ट स्थल से डीएनए के नमूने ही नहीं लिए गए, जबकि वैज्ञानिक जांच में यह एक महत्वपूर्ण कदम होता है। इसके अलावा, घटनास्थल को विस्फोट के करीब डेढ़ घंटे बाद, यानी रात 9:30 बजे धमाका होने के बाद करीब 11:15 बजे जाकर घेरा गया, जिससे साक्ष्य प्रभावित होने की संभावना बनी रही।
जिस मोटरसाइकिल में बम रखा गया था, उसकी नंबर प्लेट फर्जी पाई गई और उसके इंजन व चेसिस नंबर के साथ भी छेड़छाड़ की गई थी। इसके बावजूद, जांच एजेंसियां यह साबित करने में असफल रहीं कि वह मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की ही थी। कोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में कई गवाहों से ज़बरदस्ती बयान लिए गए, जिनमें धमकियां, शारीरिक प्रताड़ना और मानसिक दबाव जैसी बातें सामने आईं। इन सभी कारणों को अदालत ने अभियोजन पक्ष की कमजोरी और जांच की निष्पक्षता पर सवाल के तौर पर माना।
कोर्ट ने पाया कि एटीएस ने कई गवाहों और आरोपियों से मारपीट कर बयान लिए। कई गवाहों ने बाद में कोर्ट में बयान दिया कि उन्होंने डर, धमकी या यातना के चलते बयान दिए थे। इनमें से कई ‘स्टार गवाह’ मुकदमे के दौरान मुकर गए, जिससे अभियोजन पक्ष की कहानी चरमरा गई।
विस्फोट स्थल पर आरडीएक्स, अमोनियम नाइट्रेट और नाइट्राइट रेडिकल्स की पुष्टि हुई थी। फिर भी डीएनए साक्ष्य लेने के लिए विशेषज्ञ नहीं बुलाए गए, जबकि मौके पर फॉरेंसिक टीम मौजूद थी। बीडीडीएस डॉग ने विस्फोटक की पहचान की थी, फिर भी केस को वैज्ञानिक तरीके से नहीं आगे बढ़ाया गया।
एटीएस ने दावा किया था कि आरोपी ‘अभिनव भारत’ नामक एक कथित आतंकी संगठन के सदस्य थे, जो 2003 से सक्रिय था और ‘हिंदू राष्ट्र’ आर्यवर्त की स्थापना की योजना बना रहा था। कोर्ट ने माना कि यह थ्योरी आरोपियों को फंसाने के लिए गढ़ी गई थी और इसे कोई ठोस सबूत नहीं मिला। एक जांच अधिकारी मेहबूब मुनव्वर ने गवाही में कहा कि एटीएस को तत्कालीन आरएसएस प्रमुख को गिरफ्तार करने का निर्देश दिया गया था, जिससे जांच को जानबूझकर राजनीतिक दिशा दी गई।
घटना का विवरण (पराग्राफ रूप में):
29 सितंबर 2008 की रात महाराष्ट्र के नासिक ज़िले के सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील शहर मालेगांव में एक भीषण बम धमाका हुआ। यह विस्फोट रमज़ान के दौरान, रात करीब 9:30 बजे, भिक्कू चौक स्थित मस्जिद के पास हुआ, जहां उस समय भारी भीड़ मौजूद थी। इस विस्फोट में 6 लोगों की मौत हो गई और 95 अन्य घायल हो गए। घटना ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी और स्थानीय लोगों में जबरदस्त आक्रोश देखने को मिला।
इस मामले की जांच चार अलग-अलग एजेंसियों ने की — नासिक लोकल क्राइम ब्रांच (LCB), एंटी-टेररिज़्म स्क्वॉड (ATS), नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) और मालेगांव के आज़ाद नगर पुलिस स्टेशन। शुरूआती रिपोर्ट में घटना के लिए अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी, लेकिन जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, उसमें कई खामियां सामने आईं।
विस्फोट में जिन छह लोगों की मौत हुई, उनके नाम हैं: सैयद अज़हर सैयद निसार, शेख मुश्ताक शेख यूसुफ, शेख रफीक शेख मुस्तफा, फरीन उर्फ शगुफ्ता शेख लियाकत, हारून शहा मोहम्मद शहा, और इरफान जिया उल्ला खान। ये सभी आम नागरिक थे, जो उस वक्त मौके पर मौजूद थे।
इस धमाके के बाद पूरे मालेगांव में हिंसा भड़क उठी। गुस्साई भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया, वाहनों को नुकसान पहुँचाया और कई पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया। इसके चलते प्रशासन को अतिरिक्त बल तैनात करना पड़ा। विस्फोट और इसके बाद की प्रतिक्रिया ने जांच एजेंसियों के लिए चुनौतीपूर्ण हालात खड़े कर दिए।
एनआईए कोर्ट ने इस केस को “मूल रूप से दोषपूर्ण” करार देते हुए सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इस फैसले ने न केवल एक दशक से ज्यादा पुराने बहुचर्चित केस को बंद कर दिया है, बल्कि जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अब निगाहें उन राजनैतिक और सामाजिक प्रभावों पर हैं, जो इस फैसले के बाद सामने आएंगे।
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