मुंबई उच्च न्यायालय ने डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में आरोपी शरद कलसकर को जमानत दे दी है। अदालत ने यह फैसला सुनाते हुए मुख्य गवाहों के बयानों पर गंभीर संदेह जताया और जांच एजेंसी CBI की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति रंजीतसिंह भोंसले की खंडपीठ ने कहा कि कलसकर की पहचान हमलावर के रूप में पहले ही संदेह के घेरे में आ चुकी है, इसलिए जमानत देने में कोई बाधा नहीं है। अदालत ने उन्हें ₹50,000 के मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया। CBI द्वारा इस आदेश पर चार सप्ताह की रोक लगाने की मांग को भी खारिज कर दिया गया। न्यायमूर्ति गडकरी ने स्पष्ट कहा, “चूंकि हमने पहले ही आवेदक की पहचान पर संदेह जताया है, इसलिए आदेश पर रोक लगाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।”
अदालत ने अपने आदेश में मुख्य गवाह किरण कांबले के बयान को लेकर कई विरोधाभासों की ओर इशारा किया। कांबले ने गोली चलने की आवाज को पटाखों जैसी बताया, लेकिन गोली चलने के बीच समय अंतराल को लेकर स्पष्ट नहीं थे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वे आरोपियों के चेहरे के पहचान चिन्ह स्पष्ट रूप से नहीं देख पाए थे।
दूसरे प्रमुख गवाह विनय केलकर के बयान में भी कई विसंगतियां सामने आईं। उन्होंने फोटो पहचान के दौरान 70 से 85 प्रतिशत तक समानता की बात कही, लेकिन बाद में यह भी स्वीकार किया कि स्केच उनके बताए विवरण से मेल नहीं खाता। अदालत ने यह भी नोट किया कि घटना के बाद गवाहों का व्यवहार सामान्य मानवीय प्रतिक्रिया के अनुरूप नहीं था, जिससे उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठता है।
खंडपीठ ने कहा, “दोनों गवाहों का आचरण सामान्य व्यक्ति जैसा नहीं है और इससे यह संदेह पैदा होता है कि क्या उन्होंने वास्तव में घटना देखी थी।” अदालत ने यह भी पाया कि CBI ने पहचान परेड (TIP) कराने के बजाय फोटो दिखाकर पहचान स्थापित करने की कोशिश की, जो प्रक्रिया की दृष्टि से कमजोर मानी जाती है।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि कलसकर 3 सितंबर 2018 से जेल में हैं और लगभग साढ़े सात साल से अधिक समय से कैद में हैं। लंबित अपीलों के कारण मामले की जल्द सुनवाई की संभावना भी कम है। ऐसे में अदालत ने उनकी सजा को फिलहाल निलंबित करते हुए जमानत देने का फैसला किया।
उल्लेखनीय है कि डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को पुणे में सुबह की सैर के दौरान दो बाइक सवार हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में CBI ने 2014 में जांच अपने हाथ में ली थी। वहीं मई 2024 में पुणे की एक अदालत ने शरद कलसकर और सचिन अंदुरे को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जबकि अन्य तीन आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।
यह मामला लंबे समय से विवादों में रहा है, जिसमें CBI की गिरफ्तारियों पर लंबे समय से प्रश्न उठाए जा रहें है। CBI की जांच की खामियों, मीडिया ट्रायल और कथित झूठे दावों ने इस मामले को जटिल बना दिया है। हाई कोर्ट के ताजा फैसले ने एक बार फिर CBI की जांच प्रक्रिया और गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं।
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