कर्नाटक में बुधवार (20 मई)से सरकारी बस सेवाएं गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं। राज्य की चार सरकारी रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशनों के कर्मचारी संगठनों ने वेतन वृद्धि और लंबित वेतन भुगतान की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का ऐलान कर दिया है। इससे लाखों यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
संयुक्त कार्रवाई समिति (JAC) के तहत आने वाले श्रमिक संगठन पिछले तीन महीनों से सरकार के साथ बातचीत कर रहे थे। उनकी मुख्य मांग 1 मई 2024 से 25 प्रतिशत वेतन संशोधन लागू करने और कर्मचारियों के 26 महीने से लंबित वेतन बकाए का भुगतान करने की है। हालांकि राज्य सरकार ने वेतन संशोधन पर सहमति जताई थी, लेकिन यूनियनों का कहना है कि संशोधित वेतन को मई 2024 से प्रभावी किया जाए। इसी मुद्दे पर गतिरोध बना हुआ है।
रामलिंगा रेड्डी के साथ कई दौर की बातचीत के बावजूद कोई समाधान नहीं निकल पाया। सोमवार को श्रम आयुक्त के साथ हुई बैठक भी बेनतीजा रही। इसके बाद यूनियनों ने बुधवार से हड़ताल शुरू करने का फैसला कर लिया।
संयुक्त कार्रवाई समिति के संयोजक जयदेवराजे उर्स ने कहा कि श्रम आयुक्त के साथ हुई सुलह बैठक में सरकार की ओर से कोई निर्णय लेने वाला अधिकारी मौजूद नहीं था, इसलिए कर्मचारियों की मुख्य मांगों पर कोई ठोस सहमति नहीं बन सकी।
उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से श्रम आयुक्त ने यूनियनों से 25 मई तक हड़ताल टालने का अनुरोध किया और आश्वासन दिया कि मांगों पर विचार किया जाएगा। लेकिन यूनियन नेताओं ने कहा कि केवल आश्वासन के आधार पर वे अपने सदस्यों को शांत नहीं कर सकते, उन्हें ठोस निर्णय चाहिए। हालांकि यूनियनों ने अपने सदस्यों को निर्देश दिया है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपने घरों में रहें और किसी प्रकार का सड़क प्रदर्शन या हिंसक विरोध न करें।
दूसरी ओर राज्य सरकार बस सेवाएं चालू रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने में जुटी हुई है। रिपोर्टों के मुताबिक सरकार प्रशिक्षु ड्राइवरों की मदद से बसें चलाने की संभावना पर विचार कर रही है। साथ ही मुख्यमंत्री के साथ यूनियन नेताओं की एक और बैठक की संभावना भी खुली रखी गई है।
यदि हड़ताल लंबी चली तो इसका असर राज्यभर में दैनिक यात्रियों, छात्रों, कामकाजी लोगों और ग्रामीण क्षेत्रों की आवाजाही पर व्यापक रूप से पड़ सकता है। विशेष रूप से बेंगलुरु समेत बड़े शहरों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या मुख्यमंत्री स्तर पर होने वाली संभावित वार्ता से कोई समाधान निकलता है या फिर कर्नाटक को बड़े परिवहन संकट का सामना करना पड़ेगा।
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