‘शेषनाग-20’ लोइटरिंग म्यूनिशन का सफल उड़ान परीक्षण

न्यूस्पेस रिसर्च का बड़ा कदम

‘शेषनाग-20’ लोइटरिंग म्यूनिशन का सफल उड़ान परीक्षण

Successful flight test of 'Sheshnag-20' loitering munition

भारत के रक्षा नवाचार क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज हुई है। बेंगलुरु स्थित रक्षा प्रौद्योगिकी कंपनी न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज ने अपने स्वदेशी लोइटरिंग म्यूनिशन सिस्टम ‘शेषनाग-20’ का सफल उड़ान परीक्षण किया है। यह प्रणाली पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच विश्व रक्षा शो 2026 में सऊदी अरब की राजधानी रियाध में प्रदर्शित की गई थी।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार शेषनाग-20 भारत की सामरिक क्षमताओं को मजबूत करने वाली नई पीढ़ी की सटीक प्रहार प्रणाली है। यह कैनिस्टर से लॉन्च होने वाला एक इलेक्ट्रिक फिक्स्ड-विंग प्लेटफॉर्म है, जिसे जमीन या सैन्य वाहनों से आसानी से तैनात किया जा सकता है। लगभग दो मीटर विंगस्पैन और 20 किलोग्राम अधिकतम टेक-ऑफ वजन वाले इस ड्रोन में पांच किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने की क्षमता है, जिससे इसे निगरानी से लेकर लक्षित हमलों तक कई मिशनों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस लोइटरिंग म्यूनिशन की प्रमुख विशेषताओं में लगभग एक घंटे की उड़ान क्षमता और करीब 30 किलोमीटर की ऑपरेशनल रेंज शामिल है। यह अधिकतम 150 किलोमीटर प्रति घंटे की गति तक पहुंच सकता है और लगभग 6,000 मीटर की ऊंचाई तक संचालन कर सकता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर लंबे समय तक मंडराकर सटीक लक्ष्य पहचान करने के बाद हमला करने में सक्षम है।

कैनिस्टर आधारित डिजाइन के कारण इसकी लॉजिस्टिक व्यवस्था भी सरल हो जाती है। बैटरी से संचालित और ब्रशलैस डीसी मोटर से लैस होने के कारण इसकी ध्वनि भी कम होती है, जिससे गुप्त अभियानों में इसका उपयोग प्रभावी माना जाता है।

कंपनी इससे पहले भी उन्नत प्रणालियों पर काम कर चुकी है। शेषनाग श्रृंखला का लंबी दूरी वाला संस्करण शेषनाग‑150 पहले ही परीक्षणों में अपनी क्षमता दिखा चुका है। कर्नाटक में हुए प्रारंभिक परीक्षणों में इस प्रणाली ने लगभग पांच मीटर के सर्कुलर एरर प्रोबेबल के साथ सटीक लक्ष्य भेदन की क्षमता प्रदर्शित की थी।

लोइटरिंग म्यूनिशन आधुनिक युद्ध में तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे हैं क्योंकि ये खुफिया निगरानी, लक्ष्य पहचान और सटीक प्रहार को एक ही प्लेटफॉर्म में जोड़ते हैं। छोटे आकार और कम पहचान योग्य होने के कारण ये पारंपरिक बड़े यूएवी की तुलना में विवादित युद्धक्षेत्रों में अधिक प्रभावी माने जाते हैं।

भारत सरकार की मेक इन इंडिया और रक्षा आत्मनिर्भरता की नीति के तहत निजी क्षेत्र की कंपनियों को भी सैन्य तकनीक विकास में बढ़ावा दिया जा रहा है। इस संदर्भ में बेंगलुरु का एयरोस्पेस इकोसिस्टम तेजी से उभर रहा है और कई स्टार्ट-अप उन्नत ड्रोन तथा स्वायत्त प्रणालियों पर काम कर रहे हैं।

रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि शेषनाग-20 जैसी प्रणालियां भविष्य में पैदल सेना, बख्तरबंद इकाइयों और उच्च मूल्य वाले लक्ष्यों के खिलाफ अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इसके सफल परीक्षण से यह भी संकेत मिलता है कि भारत स्वदेशी ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन तकनीक के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है, जो आने वाले वर्षों में सैन्य आधुनिकीकरण और निर्यात संभावनाओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

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