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Sunday, October 18, 2026
होमन्यूज़ अपडेट"सुदर्शन चक्र ढाल भी बनेगा और तलवार भी": CDS चौहान!

“सुदर्शन चक्र ढाल भी बनेगा और तलवार भी”: CDS चौहान!

सेना प्रमुख ने बताया भारत का ‘आयरन डोम’ विज़न

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भारत अपने ‘आयरन डोम’ जैसे स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम पर काम कर रहा है। इसका नाम मिशन सुदर्शन चक्र रखा गया है। यह घोषणा प्रधान रक्षा अध्यक्ष (CDS) जनरल अनिल चौहान ने मंगलवार (26 अगस्त)को मध्य प्रदेश के महू स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित रण संवाद 2025 के दौरान की। इससे कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर इस महत्वाकांक्षी परियोजना का जिक्र किया था।

जनरल चौहान ने कहा कि यह प्रणाली दुश्मन के हवाई खतरों का पता लगाने, ट्रैक करने और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए तैयार की जा रही है। इसके तहत इलेक्ट्रॉनिक व साइबर उपायों (सॉफ्ट किल) के साथ-साथ मिसाइल और लेज़र हथियारों (हार्ड किल) का भी इस्तेमाल किया जाएगा। उन्होंने कहा, “इसका लक्ष्य भारत की सामरिक, नागरिक और राष्ट्रीय महत्व की जगहों को सुरक्षित करना है। यह ढाल भी बनेगा और तलवार भी।”

CDS ने स्पष्ट किया कि यह परियोजना भारत का अपना ‘आयरन डोम या गोल्डन डोम’ होगी, जिसमें ज़मीनी, हवाई, समुद्री, पनडुब्बी और अंतरिक्ष आधारित सेंसरों का एकीकृत नेटवर्क तैयार किया जाएगा। इसके लिए मल्टी-डोमेन इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉन्निसेंस (ISR) जरूरी होगा। साथ ही, चौहान ने बताया कि इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि विशाल मात्रा में डेटा का तुरंत विश्लेषण कर वास्तविक समय में प्रतिक्रिया दी जा सके।

यह आयोजन तीनों सेनाओं का साझा संवाद है, जिसमें युद्ध, रणनीति और भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा की जा रही है। इसमें वर्तमान अधिकारियों ने अपने ऑपरेशनल अनुभव और आधुनिक युद्धक्षेत्र से मिली सीख साझा कीं। कार्यक्रम में संयुक्त सिद्धांत (joint doctrines) और भविष्य की तकनीकी क्षमताओं का रोडमैप भी जारी किया गया। जनरल चौहान ने स्वीकार किया कि इतने बड़े स्तर के प्रोजेक्ट के लिए ‘राष्ट्रव्यापी दृष्टिकोण’ (whole-of-nation approach) की ज़रूरत होगी। उन्होंने भरोसा जताया कि भारत इसे सस्ती लागत पर पूरा करने में सक्षम है।

मिशन सुदर्शन चक्र के जरिए भारत अपनी वायु रक्षा क्षमता को अगले स्तर पर ले जाने जा रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, इस प्रणाली के आने से भारत न केवल अपने रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा कर सकेगा, बल्कि भविष्य के हाइब्रिड युद्धों में बढ़त भी हासिल करेगा।

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