न्याय व्यवस्था के लिए बुनियादी सुविधाएं न देना सुखू सरकार को पड़ा महंगा; 10 लाख का जुर्माना

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का राज्य सरकार को झटका

न्याय व्यवस्था के लिए बुनियादी सुविधाएं न देना सुखू सरकार को पड़ा महंगा; 10 लाख का जुर्माना

The Sukhu government has been fined ₹1 million for failing to provide basic facilities for the judicial system.

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। न्यायिक बुनियादी ढांचे से जुड़े मामले में अदालत के निर्देशों की अनदेखी करने पर सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। दरअसल, हाईकोर्ट ने कई बार राज्य सरकार को न्याय व्यवस्था के लिए आवश्यक ढांचे को सुधारने, नए न्यायालय बनाने और रिक्त पदों को भरने के निर्देश दिए थे, लेकिन बार-बार चेतावनी के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

इस पर नाराजगी जताते हुए मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सख्त रुख अपनाया। अदालत ने साफ कहा कि सरकार केवल आश्वासन दे रही है, लेकिन जमीन पर कोई काम नजर नहीं आ रहा। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं, जिससे काम और ज्यादा लंबित हो गया।

सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे में कहा गया था कि कुछ प्रस्ताव कैबिनेट के सामने रखे जाएंगे। इस पर अदालत ने सवाल उठाया कि जब कैबिनेट की बैठकें नियमित हो रही हैं, तो इतने समय में निर्णय क्यों नहीं लिया गया? करीब तीन महीने बीत जाने के बावजूद कोई ठोस प्रगति न होने पर अदालत ने इसे गंभीरता से लिया।

अदालत ने कुछ खास जगहों पर न्यायाधीशों और अदालतों की जरूरत बताई थी, लेकिन उस पर काम करने के बजाय सरकार ने अन्य स्थानों पर अदालत बनाने का प्रस्ताव दिया, जिसकी मांग ही नहीं की गई थी। इस पर भी कोर्ट ने हैरानी जताई और पूछा कि सरकार आखिर किस आधार पर फैसले ले रही है।

इसके अलावा, एनडीपीएस (मादक पदार्थ) मामलों की बढ़ती संख्या को लेकर भी अदालत ने चिंता जताई। केंद्र सरकार के बार-बार निर्देश देने के बावजूद राज्य सरकार ने विशेष अदालतें स्थापित करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अदालत ने कहा कि ‘ड्रग-फ्री’ हिमाचल के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जरूरी ढांचा विकसित नहीं किया जा रहा है।

कोर्ट ने कहा कि बढ़ती आबादी और मामलों को देखते हुए न्यायिक ढांचे का विस्तार जरूरी है। 20 साल पुरानी व्यवस्था से आज की जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं। इस तरह का रवैया सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी से दूर जाने जैसा है।

इन सभी पहलुओं को देखते हुए अदालत ने राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया और यह राशि न्यायालय के रजिस्ट्रार कार्यालय में जमा करने का आदेश दिया।

साथ ही, वित्त विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिए गए हैं कि वे अगले बजट में न्याय व्यवस्था के लिए कितना प्रावधान किया जाएगा, इसकी विस्तृत जानकारी दें और यह भी स्पष्ट करें कि पिछले वर्ष की तुलना में इसमें बढ़ोतरी हुई है या नहीं। हाईकोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगली सुनवाई तक यदि सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो और सख्त आदेश जारी किए जा सकते हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 4 मई को होगी।

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