“क्या कसाब को भी ट्रायल में देरी पर बेल मिल जाती?” केंद्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट से सवाल

उमर खालिद को जमानत पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से उठा विवाद, UAPA मामलों में अलग-अलग फैसलों पर सरकार ने जताई चिंता, केंद्र बोला- हर केस के तथ्य अलग, सिर्फ देरी आधार नहीं हो सकती

“क्या कसाब को भी ट्रायल में देरी पर बेल मिल जाती?” केंद्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट से सवाल

'Why reservation for children if both parents are IAS officers?' Supreme Court raises questions on creamy layer

गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग टिप्पणियों पर केंद्र सरकार ने गंभीर सवाल उठाए हैं। केंद्र ने अदालत से पूछा कि क्या सिर्फ ट्रायल में देरी होने के आधार पर आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में आरोपियों को जमानत दी जा सकती है।

18 मई को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने UAPA मामले के आरोपी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत दे दी। अंद्राबी पिछले पांच वर्षों से नार्को-टेरर मामले में जेल में बंद था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि लंबे समय तक जेल में रखना उचित नहीं ठहराया जा सकता और UAPA मामलों में भी “बेल नियम है, जेल अपवाद।”

इसी दौरान अदालत ने जनवरी 2026 के एक पुराने फैसले पर भी टिप्पणी की, जिसमें दिल्ली दंगों के मामले में आरोपी  उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। उस समय जस्टिस कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ ने कहा था कि दोनों की भागीदारी का स्तर अधिक गंभीर था।

18 मई के फैसले में जस्टिस भुइयां ने टिप्पणी की कि उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने वाला फैसला सुप्रीम कोर्ट की पूर्व मिसालों को कमजोर करता है। उन्होंने कहा, “वे बाध्यकारी पूर्व फैसलों को कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज नहीं कर सकते।”

यह टिप्पणी 2021 के चर्चित यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब मामले के संदर्भ में की गई। केए नजीब पर 2010 में मलयालम प्रोफेसर टीजे जोसेफ का हाथ काटने की साजिश में शामिल होने का आरोप था। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि त्वरित सुनवाई का अधिकार प्रभावित होने पर UAPA मामलों में भी जमानत दी जा सकती है।

हालांकि केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और सिर्फ जेल में बिताए गए समय के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने अदालत में 26/11 मुंबई हमले के आतंकी अजमल कसाब और पाकिस्तान स्थित आतंकी हाफिज सईद का उदाहरण देते हुए कहा, “अगर अजमल कसाब के मामले में बड़ी संख्या में गवाह हों और ट्रायल में 7-8 साल लग जाएं, तो क्या उसे भी बेल दे दी जाएगी? ऐसा नहीं हो सकता।” उन्होंने आगे कहा, “मान लीजिए हाफिज सईद को पाकिस्तान से भारत लाया जाए और विदेशी सबूत जुटाने में पांच साल लग जाएं, तो क्या सिर्फ देरी के आधार पर उसे जमानत दे दी जाएगी?”

केंद्र की ओर से पेश अधिवक्ता रजत नायर ने भी कहा कि अदालत को हर मामले में आरोपी की भूमिका, अपराध की गंभीरता, ट्रायल की स्थिति और देरी की वजह जैसे पहलुओं पर विचार करना चाहिए।

एस वी राजू ने कहा, “ताजा फैसले में कहा गया कि आरोपी की भूमिका और अपराध की प्रकृति देखने की जरूरत नहीं है। यह तरीका सही नहीं हो सकता। हर मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।” उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अगर ट्रायल में देरी खुद आरोपी की वजह से हो रही हो, तो केवल देरी को जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता। इस पूरे घटनाक्रम ने UAPA मामलों में जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न पीठों द्वारा दिए गए फैसलों और उनकी व्याख्या को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

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