काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के हिंदी विभाग में शोध प्रवेश प्रक्रिया को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने शुक्रवार को तीखा आरोप लगाया है। परिषद ने दावा किया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के आरक्षण के नाम पर विभाग में घोटाला हुआ है और जानबूझकर दो पात्र छात्रों को प्रवेश से वंचित किया गया।
एबीवीपी का कहना है कि यह मात्र एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक बड़ी साजिश का हिस्सा है, जिसमें माओवादी विचारधारा से प्रभावित तत्व सक्रिय हैं। परिषद ने विश्वविद्यालय प्रशासन और संबंधित विभागीय अधिकारियों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इस पूरे प्रकरण में पारदर्शिता का अभाव है और अब मामला विश्वविद्यालय की यूएसीबी समिति के पास विचाराधीन है।
परिषद का आरोप है कि कुछ राजनीतिक दल और शिक्षा विरोधी ताकतें इस मुद्दे को जानबूझकर गलत दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रही हैं। एबीवीपी ने अपने बीएचयू इकाई मंत्री भास्करादित्य त्रिपाठी के खिलाफ चल रहे सोशल मीडिया अभियान को “दुष्प्रचार” करार देते हुए उसकी निंदा की है। परिषद का कहना है कि यह हमला किसी एक छात्रनेता पर नहीं, बल्कि पूरे छात्र समुदाय की आवाज़ को दबाने का प्रयास है।
एबीवीपी ने चेताया है कि अगर विश्वविद्यालय प्रशासन समय पर ठोस कदम नहीं उठाता, तो परिषद छात्रहित में संघर्ष का रास्ता अपनाने को बाध्य होगी। काशी प्रांत के मंत्री अभय प्रताप सिंह ने कहा, “हिंदी विभाग में जो हो रहा है, वह अकादमिक लापरवाही नहीं, बल्कि विचारधारा की लड़ाई है। कुछ लोग बीएचयू को माओवादी मानसिकता की प्रयोगशाला बनाना चाहते हैं।”
परिषद ने इस पूरे प्रकरण पर चार अहम मांगें रखी हैं:
- ईडब्ल्यूएस आरक्षण में हुए कथित घोटाले की निष्पक्ष जांच।
- दोषी शिक्षकों और अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई।
- ईडब्ल्यूएस आरक्षण संबंधी निर्णय भारत सरकार की गाइडलाइन्स के अनुसार लिया जाए।
- विश्वविद्यालय परिसर को शिक्षा विरोधी राजनीतिक गतिविधियों से मुक्त कराया जाए।
एबीवीपी इकाई अध्यक्ष प्रशांत राय ने बयान में कहा, “यह लड़ाई सिर्फ दो छात्रों की नहीं है, यह शोध प्रक्रिया की पवित्रता की लड़ाई है। अगर विश्वविद्यालय दबाव में आकर निर्णय लेता है, तो यह बीएचयू की आत्मा को गिरवी रखने जैसा होगा। परिषद ऐसा होने नहीं देगी।”
बीएचयू में ईडब्ल्यूएस आरक्षण को लेकर उठा यह विवाद अब केवल प्रवेश प्रक्रिया का मुद्दा नहीं रह गया है। एबीवीपी इसे वैचारिक संघर्ष और विश्वविद्यालय की आत्मा की रक्षा से जोड़ रही है। विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए यह एक निर्णायक मोड़ है, जहां पारदर्शिता और संवैधानिक दायित्व दोनों की परीक्षा हो रही है। आने वाले दिनों में यह मामला छात्र आंदोलन के केंद्र में आ सकता है।
यह भी पढ़ें:
नक्सल मुक्त हुआ बस्तर का यह गांव भाजपा नेता ने जाहिर की ख़ुशी !
यूनिवर्सिटी में प्यून जांचता था आंसर शीट, वीडिओ वारयल होने के दो महीने बाद कारवाई!
मायावती का भाषा विवाद पर संदेश, कहा ऐसी नीतियों से राज्यों और केंद्र के बीच टकराव स्वाभाविक



