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Wednesday, February 25, 2026
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AIMIM की 32 सीटों पर एंट्री से किसे होगा नुकसान, किसे मिलेगा फायदा?

बिहार चुनाव में ओवैसी का दांव

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बिहार विधानसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है और सभी राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण साधने में जुट गए हैं। इस बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) ने राज्य की 32 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर सियासी हलचल बढ़ा दी है। पार्टी ने पशुपति पारस की लोजपा (रामविलास) और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया है। AIMIM के मैदान में उतरने से यह बहस फिर तेज हो गई है कि ओवैसी महागठबंधन के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं।

साल 2020 के विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से 5 सीटों पर जीत मिली। इनमें से 4 सीटों पर एनडीए दूसरे स्थान पर रहा, जबकि केवल जोकीहाट में राजद उपविजेता रहा। बाद में इन 5 में से 4 विधायक राजद में शामिल हो गए थे। AIMIM किसी भी सीट पर दूसरे स्थान पर नहीं रही, और ज्यादातर जगहों पर तीसरे से लेकर तेरहवें स्थान तक खिसक गई।

दिलचस्प यह रहा कि ओवैसी की पार्टी उन्हीं सीटों पर सफल रही जहां मुस्लिम आबादी 60% से अधिक थी। जैसे-जैसे मुस्लिम जनसंख्या घटती गई, AIMIM का प्रभाव भी घटता गया।

ओवैसी की पार्टी ने जिन 32 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है, उनमें 7 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 60% से अधिक है — बहादुरगंज, कोचाधामन, किशनगंज, अमौर, बायसी, बलरामपुर और जोकीहाट।
5 सीटों पर मुस्लिम आबादी 40–60% के बीच है: ठाकुरगंज, कस्बा, प्राणपुर, कदवा और अररिया।
जबकि 12 सीटों पर मुस्लिम आबादी 25–40% के बीच है: मनिहारी, बरारी, ढाका, नरकटियागंज, भागलपुर, सिवान, जाले, केवटी, दरभंगा ग्रामीण, गौड़ा बौराम, बाजपट्टी और बिस्फी।

इन 32 सीटों में से 16 सीटें महागठबंधन के पास थीं, 5 AIMIM ने जीती थीं और 11 एनडीए के खाते में गई थीं। इन सीटों पर महागठबंधन के आधे उम्मीदवार मुस्लिम रहे हैं।

AIMIM इन 32 में से 17 नई सीटों पर पहली बार उतर रही है। इनमें 8 सीटें महागठबंधन और 9 एनडीए ने पिछली बार जीती थीं। खास बात यह है कि इन सीटों में कई जगहों पर महागठबंधन के मुस्लिम उम्मीदवार भाजपा के प्रत्याशियों से हार गए थे। उदाहरण के तौर पर केवटी सीट पर राजद के अब्दुल बारी सिद्दीकी भाजपा के मुरारी मोहन झा से हार गए थे। वहीं नाथनगर एकमात्र सीट थी जहां राजद के अली अशरफ सिद्दीकी ने जीत दर्ज की थी।

इस बार AIMIM के उम्मीदवार इन क्षेत्रों में उतरते हैं तो मुकाबले में वोट कटने का असर दिख सकता है, खासकर मुस्लिम वोट बैंक वाले इलाकों में। CSDS के पोस्ट पोल सर्वे के मुताबिक, 76% मुस्लिम मतदाताओं ने पिछली बार महागठबंधन को वोट दिया था, जबकि 11% ने AIMIM गठबंधन को। अगर इस बार यह 76% वोटों में से भी कुछ हिस्सा AIMIM की ओर खिसकता है, तो यह महागठबंधन के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।

हालांकि राजनीतिक विश्लेषक आशीष रंजन का मानना है कि AIMIM के लिए पिछली बार जैसा प्रदर्शन दोहराना कठिन होगा। वे कहते हैं, “पिछले चुनाव में ओवैसी को अल्पसंख्यकों की राजनीतिक भागीदारी की आवाज़ के रूप में कुछ समर्थन मिला था, लेकिन इस बार माहौल अलग है। महागठबंधन के वोटों में बड़ी सेंध की संभावना कम है।”

ओवैसी की AIMIM ने भले ही फिलहाल 32 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की हो, लेकिन पार्टी का दावा 100 सीटों तक जाने का है। यह तय है कि AIMIM के मैदान में उतरने से महागठबंधन के समीकरण प्रभावित होंगे, खासकर सीमांचल और मुस्लिम बहुल इलाकों में। मगर AIMIM के लिए 2020 जैसी सफलता दोहराना आसान नहीं होगा, क्योंकि बिहार की राजनीति आज कहीं ज्यादा जटिल और प्रतिस्पर्धी हो चुकी है।

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