दिल्ली की एक विशेष अदालत ने शुक्रवार (28 फरवरी) को दिल्ली आबकारी नीति मामले में सभी 23 आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया। इस सूची में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी शामिल हैं। अदालत ने कहा कि 2021–22 की आबकारी नीति के निर्माण में किसी व्यापक साजिश या आपराधिक मंशा का प्रथमदृष्टया कोई आधार नहीं बनता।
विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) जितेंद्र सिंह ने केंद्रीय जांच ब्यूरो(CBI) द्वारा दायर मामले को खारिज करते हुए कहा, “एक्साइज पॉलिसी में कोई बड़ी साज़िश या अपराध का इरादा नहीं था।” अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन का मामला न्यायिक परीक्षण में टिक नहीं पाया और जांच एजेंसी ने महज अनुमानों के आधार पर साजिश का एक कथानक गढ़ने की कोशिश की।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रथमदृष्टया किसी भी आरोपी के खिलाफ मामला नहीं बनता। साथ ही, सीबीआई की जांच पद्धति पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, “अगर इस तरह के व्यवहार की इजाज़त दी जाती है, तो यह संविधान के सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन होगा। ऐसा व्यवहार जिसमें किसी आरोपी को माफ़ी दे दी जाती है और फिर उसे सरकारी गवाह बना दिया जाता है, उसके बयानों का इस्तेमाल जांच/कहानी में कमियों को भरने और और लोगों को आरोपी बनाने के लिए किया जाता है, यह गलत है।”
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जिस तरीके से एक सार्वजनिक सेवक कुलदीप सिंह को मामले में आरोपी नंबर एक बनाया गया, उस संबंध में संबंधित सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जाए।
पृष्ठभूमि: क्या था मामला?
नवंबर 2021 में दिल्ली सरकार ने नई शराब नीति लागू की थी। जून 2022 में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने इस नीति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। जुलाई 2022 में दिल्ली के मुख्य सचिव ने नीति में कथित अनियमितताओं की ओर ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद दिल्ली के उपराज्यपाल ने CBI जांच की सिफारिश की।
CBI ने मामला दर्ज किया और बाद में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत जांच शुरू की। इस दौरान कई गिरफ्तारियां हुईं, जिनमें केजरीवाल और सिसोदिया भी शामिल थे।
अब अदालत के ताजा आदेश के बाद इस बहुचर्चित मामले में सभी आरोपियों को राहत मिल गई है। फैसले के राजनीतिक और कानूनी असर को लेकर विभिन्न दलों और विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, जबकि जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी बहस तेज हो गई है।
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