आसाम विधानसभा ने बुधवार (27 मई) को यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) बिल पारित कर दिया। इसके साथ ही असम, उत्तराखंड और गुजरात के बाद UCC कानून को मंजूरी देने वाला देश का तीसरा राज्य बन गया है। इस विधेयक को विधानसभा के पांच दिवसीय सत्र के अंतिम दिन चर्चा के बाद पारित किया गया। विपक्षी दलों ने बिल को आगे विचार-विमर्श के लिए सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने की मांग की थी, लेकिन सरकार ने इसे सीधे सदन से पारित करा लिया।
हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने सोमवार को यह बिल सदन में पेश किया था। प्रस्तावित कानून का मुख्य उद्देश्य बहुविवाह पर रोक लगाना और लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाना है।
हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कानून असम में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होगा। बिल में कई दंडात्मक प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। इसके तहत बिगैमी या पॉलिगैमी यानी एक से अधिक विवाह करने पर सात साल तक की जेल हो सकती है, जबकि लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन नहीं कराने पर तीन महीने तक की सजा का प्रावधान रखा गया है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, रायजोर दल और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने बिल का विरोध करते हुए कहा कि इसे लागू करने से पहले विभिन्न समुदायों और हितधारकों से व्यापक चर्चा की जानी चाहिए थी। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बिल के उद्देश्य और कारणों के बयान में कहा,“इस बिल का मकसद शादी, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कानूनों को एक करना और आसान बनाना है।”
सरकार के मुताबिक यह कानून विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों से जुड़े कानूनों को सरल और एक समान बनाने की कोशिश है। बिल में पुरुषों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष तय की गई है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह कानून राज्य की सांस्कृतिक विविधता की रक्षा भी करता है क्योंकि धार्मिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह की अनुमति जारी रहेगी। कानून में विवाह और तलाक का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन प्रस्तावित किया गया है ताकि भरण-पोषण, संपत्ति अधिकार और अन्य कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
बिल में पहली बार लिव-इन रिलेशनशिप के लिए भी कानूनी ढांचा तैयार किया गया है। सरकार का कहना है कि रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होने से ऐसे संबंधों में रहने वाले लोगों और उनसे जन्म लेने वाले बच्चों के अधिकारों को कानूनी मान्यता और सुरक्षा मिलेगी।
उत्तराधिकार कानूनों में भी बड़े बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि UCC का उद्देश्य संपत्ति के निष्पक्ष और समान वितरण को सुनिश्चित करना है। इसके तहत संपत्ति के बंटवारे के लिए समान और जेंडर-न्यूट्रल नियम लागू किए जाएंगे।
बिल के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बिना वसीयत के मृत्यु को प्राप्त होता है, तो उसकी संपत्ति पति-पत्नी, बच्चों और माता-पिता समेत प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों के बीच समान रूप से बांटी जाएगी। वहीं कोई भी वयस्क व्यक्ति लिखित और गवाहों की मौजूदगी में वैध वसीयत बना सकेगा। कानून में कई सख्त दंडात्मक प्रावधान भी शामिल हैं। बहुविवाह और पॉलिगैमी को भारतीय न्याय संहिता की धारा 82 के तहत अपराध माना जाएगा, जिसमें सात साल तक की जेल हो सकती है।
बाल विवाह, बिना वैध सहमति के विवाह, धोखाधड़ी या दबाव में कराए गए विवाह पर भी जेल और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। प्रतिबंधित रिश्तों में विवाह करने पर छह महीने तक की जेल और 50 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है, जब तक कि वह किसी मान्य परंपरा के अंतर्गत न आता हो।
बिल में विवाह या तलाक का 60 दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन नहीं कराने पर 10 हजार रुपये तक का जुर्माना प्रस्तावित है। फर्जी दस्तावेज जमा करने पर तीन महीने तक की जेल और 25 हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इसी तरह लिव-इन रिलेशनशिप का एक महीने के भीतर पंजीकरण नहीं कराने पर तीन महीने तक की जेल या 10 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
देश में सबसे पहले UCC लागू करने वाला राज्य उत्तराखंड बना था, जहां पुष्कर सिंह धामी सरकार ने फरवरी 2024 में यह कानून पारित कराया था। इसके बाद इस वर्ष मार्च में भूपेंद्र पटेल सरकार के नेतृत्व में गुजरात विधानसभा ने भी UCC बिल पास किया था।
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