सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर बुधवार (27 मई) को बड़ा फैसला सुनाया। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने निर्णय दिया।
याचिकाओं में चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे SIR की वैधता को चुनौती दी गई थी। अदालत को यह तय करना था कि क्या चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 326, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उससे जुड़े नियमों के तहत वर्तमान स्वरूप में एसआईआर कराने का अधिकार है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत ने कहा की मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाए जाने का मतलब उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त होना नहीं है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग की जांच केवल चुनावी सूची में नाम शामिल करने या हटाने तक सीमित है, नागरिकता तय करना उसका अंतिम अधिकार नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि SIR प्रक्रिया के तहत की जाने वाली जांच को नागरिकता निर्धारण प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “कमीशन मतदाता सूचि से नाम हटा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह भारत का नागरिक नहीं रहा। इसका नागरिकता तय करने से कोई लेना-देना नहीं है।”
अदालत की इस टिप्पणी को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि याचिकाकर्ताओं और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि भारत निर्वाचन आयोग द्वारा चलाया जा रहा SIR अभियान पिछले दरवाजे से नागरिकता जांच जैसा है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के लिए नागरिकता से जुड़े पहलुओं की सीमित जांच कर सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त करने या अंतिम रूप से तय करने का अधिकार उसके पास नहीं है।
यह मामला उन याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सामने आया जिनमें SIR प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी गई थी। विवाद उस नियम को लेकर शुरू हुआ था जिसके तहत जिन मतदाताओं के नाम वर्ष 2002 या 2003 की मतदाता सूची में नहीं थे, उन्हें अपने पूर्वजों या परिवार का संबंध पुराने मतदाता रिकॉर्ड से साबित करने को कहा गया था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह प्रक्रिया गरीबों, प्रवासी मजदूरों और दस्तावेज न रखने वाले लोगों को मतदान अधिकार से वंचित कर सकती है। उनका कहना था कि नागरिकता तय करना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
यह विवाद तब और बढ़ गया जब चुनाव आयोग ने पिछले वर्ष जून में बिहार में SIR प्रक्रिया शुरू की और बाद में इसे पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु समेत कई राज्यों तक विस्तारित कर दिया। फिलहाल 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में SIR का तीसरा और अंतिम चरण चल रहा है।
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने अदालत में कहा था कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची को शुद्ध और पारदर्शी बनाने के लिए जरूरी है ताकि फर्जी या अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाए जा सकें। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम निर्देश देते हुए कहा कि जिन लोगों के नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर मतदाता सूची से हटाए जाएंगे, उनके मामलों को केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “ECI को निर्देश दिया जाता है कि ऐसे मामलों को चार हफ़्ते के अंदर नागरिकता एक्ट, 1955 के तहत सक्षम अथॉरिटी को भेजा जाए, ताकि उनकी नागरिकता के दावों का पता लगाया जा सके।”
इस आदेश के तहत चुनाव आयोग को ऐसे मामलों को चार सप्ताह के भीतर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन संबंधित प्राधिकरण को भेजना होगा, जो नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत अंतिम फैसला करेगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनावी अधिकारों और नागरिकता विवाद से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक स्पष्टता के रूप में देखा जा रहा है।
यह भी पढ़ें:
भारत में इबोला का खतरा? युगांडा से लौटी महिला में मिले लक्षण, बेंगलुरु में किया गया आइसोलेट
कनाडा में निवेश बढ़ाने के मिशन पर पीयूष गोयल, शीर्ष CEOs से की मुलाकात



