प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उठाए गए अप्रत्याशित कदम के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में हलचल मची है। कुछ सप्ताह से डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत की ऊर्जा नीतियों पर दिए गए बयान के बाद यह विवाद तेज हुआ। ट्रम्प ने दावा किया था कि मोदी ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है| बाद में उन्होंने कहा कि खरीद कम हुई है। बावजूद इसके भारत ने नीति-निर्णय में स्वतन्त्रता बनाए रखते हुए रूस से तेल की खरीद में वृद्धि की, जिससे वैश्विक ऊर्जा संतुलन पर असर पड़ा।
ऊर्जा खरीद तो एक पहलू थी; असली प्रभाव तब दिखा जब भारत ने रूस से रक्षा सौदों को तेज करने की तैयारी शुरू की। रक्षा मंत्रालय ने कई सैन्य आधुनिकीकरण परियोजनाओं को प्राथमिक मंज़ूरी दी है, जिनमें एस-400 वायु रक्षा प्रणाली के लिए बड़े पैमाने पर मिसाइलों का अधिग्रहण भी शामिल है।
इन परियोजनाओं की कुल अनुमानित लागत लगभग 79,000 करोड़ रुपये बताई जा रही है। एस-400 ऑर्डर से प्रणाली की आपूर्ति और भंडार दोनों मजबूत होंगे, जो हालिया सीमाई घटनाओं में निर्णायक साबित हो सकते हैं।
विश्लेषक कह रहे हैं कि भारत का यह रुख स्पष्ट संदेश देता है: राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा-रक्षा जरूरतों में नई दिल्ली किसी बाहरी दबाव को प्राथमिकता नहीं देगी। पश्चिमी देशों में चिंताएँ हैं, पर भारत ने अपनी ऊर्जा-संदेह मिटाकर आर्थिक और सुरक्षा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र नीति अपनाई है।
यह कदम न केवल घरेलू अर्थव्यवस्था को सस्ता ईंधन उपलब्ध कराएगा बल्कि रक्षा क्षमताओं को भी मजबूत करेगा, जिससे क्षेत्रीय संतुलन पर असर पड़ने की संभावना है।
सरकारी और ऊर्जा स्रोतों के अनुसार अक्टूबर में रूस से तेल आयात में 2.5 लाख बैरल की बढ़ोतरी हुई और कुल आयात 18 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया है। इससे भारत को सस्ती ऊर्जा मिली और आर्थिक दबाव कम हुआ, जबकि वैश्विक समीकरण बदल रहे हैं।
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