लोजपा (रामविलास) को 29 सीटें और आरएलएम व हम को 6-6 सीटें देकर भाजपा ने सभी सहयोगियों को साथ रखने की कोशिश की है।
यह बंटवारा सिर्फ़ संख्या का खेल नहीं, बल्कि भाजपा की “धीरे चलो, लेकिन सही चलो” नीति का हिस्सा है। महाराष्ट्र में अपनाए गए धैर्यपूर्ण मॉडल—जहां भाजपा ने पहले सहयोगी को नेतृत्व दिया और बाद में सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ली—का प्रभाव बिहार में भी दिख रहा है। अगर भाजपा के उम्मीदवार जदयू से बेहतर प्रदर्शन करते हैं, तो मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी की संभावना बढ़ जाएगी।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की घटती सक्रियता और चिराग पासवान की भूमिका इस चुनाव को और दिलचस्प बनाती है। 2020 में जदयू को कमजोर करने वाली लोजपा (रामविलास) इस बार भाजपा की “रणनीतिक सहयोगी” बनकर सामने आई है। भाजपा ने पासवान को अधिक सीटें देकर न केवल उन्हें संतुष्ट किया है, बल्कि नीतीश पर दबाव भी बनाए रखा है।
अमित शाह ने हालिया बैठक में स्पष्ट किया कि भाजपा कार्यकर्ता इस बार एनडीए के लिए संयुक्त रूप से प्रचार करेंगे, ताकि 2020 जैसी मतों की बिखराव स्थिति दोबारा न हो। वहीं दूसरी ओर, महागठबंधन सीट बंटवारे की खींचतान में उलझा हुआ है, जिससे उसकी एकजुटता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
कुल मिलाकर, एनडीए की रणनीतिक स्पष्टता और विपक्ष की अव्यवस्था के बीच भाजपा ने शुरुआती बढ़त हासिल कर ली है। अब देखना यह है कि क्या महागठबंधन समय रहते स्थिति संभाल पाएगा या भाजपा बिहार की सत्ता की बाज़ी अपने नाम लिख देगी।
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